मंगलाचरण दोहा : बुद्धिहीन तनु जानिके

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार ॥

शब्दार्थः तनु = शरीर । सुमिरौं = स्मरण करना । देहु = दीजिए । हरहु = हर लेना, नाश कर देना । बिकार = दोष । 

अर्थः हे पवनकुमार ! मैं आपका स्मरण करता हूँ । आप तो जानते ही हैं कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सद्बुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःख व दोषों का नाश कीजिए ।

गूढ़ अर्थः  मंगलाचरण के प्रथम दोहे में श्री तुलसीदासजी “बरनउँ रघुबर बिमल जसु” लिखकर श्रीरघुबर के निर्मल यश का वर्णन करने का संकल्प प्रभु श्री हनुमानजी को बता चुके हैं। इस दोहे में वे प्रभु श्री हनुमानजी से प्रार्थना कर रहे कि इतना बड़ा संकल्प तो ले लिया पर इसे पूरा कर पाना मेरे लिए संभव नहीं अतः आप मुझे बुद्धिहीन जानकर मुझे बल, बुद्धि एवं विद्या दीजिए एवं मेरे विकारों को दूर कीजिए। 

बुद्धिहीन तनु जानिकेः इस दोहे में श्री तुलसीदासजी स्वयं को बुद्धिहीन कह रहे हैं और ऐसा कौन कह रहे है जो स्वयं शास्त्र मर्मज्ञ हैं, विद्वान हैं, ज्ञान, बुद्धि एवं कवित्त शक्ति के सागर हैं, श्रीरामचरितमानसजी, श्रीविनयपत्रिका, श्रीदोहावली, श्रीकवितावली आदि अनेक कृतियों के रचयिता हैं और इन सबसे अधिक प्रभु श्री रामजी के परम भक्त हैं । परन्तु ऐसा कहकर वे अपनी विनम्रता, अहंकार-शून्यता एवं दीनता का परिचय दे रहे हैं, क्योंकि इससे पूर्व गुरुपदरज से अपने मन को पवित्र कर चुकें हैं । वैसे भी साधक में अगर विनय ना हो तो वह फिर भक्ति का पात्र ही कहाँ रह जाएगा क्योंकि “विनयाद् याति पात्रताम्”।  

यहाँ बुद्धि’ शब्द भगवत् सेवा के उपयोग में आने वाली बुद्धि एवं तनु’ शब्द सूक्ष्म शरीर का बोधक है, क्योंकि बुद्धि को सूक्ष्म शरीर का ही एक अंग माना गया है। अर्थात मेरी बुद्धि तमोगुण की अधिकता से श्रीरघुबर के यश का वर्णन करने के योग्य नहीं है। श्री तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानसजी के बालकाण्ड में लिखते है “करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा॥” अर्थात मैं श्री रघुनाथजी के गुणों का वर्णन करना चाहता हूँ, परन्तु मेरी बुद्धि छोटी है और प्रभु श्री रामजी का चरित्र अथाह है। साथ ही कहते है “कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥” कहाँ तो श्री रघुनाथजी के अपार चरित्र, कहाँ संसार में आसक्त मेरी बुद्धि!। इसलिए हे पवनकुमार आपका स्मरण करता हूँ

सुमिरौं पवन-कुमारः श्री हनुमान चालीसाजी में श्री तुलसीदासजी प्रभु श्री हनुमानजी को कई नामों से संबोधित करते हैं यथा – पवनकुमार’, हनुमान’, कपीस’, बजरंगी’, महाबीर’ आदि। श्री तुलसीदासजी की यह शैली रही है कि वे संदर्भ प्रसंगादि को देखते हुए यथोचित नाम से ही संबोधित करते हैं। जहाँ-जहाँ जो जो नाम आते जाएंगे हम उन्हें विस्तार से समझते जाएंगे एवं यह भी कि उस स्थान पर उसी नाम का प्रयोग क्यों किया गया है। यहाँ श्री तुलसीदासजी पवनकुमार’ कहकर प्रभु श्री हनुमानजी को स्मरण कर रहे हैं। इसके कई कारण मिलते है- 

(१) श्री जामवन्तजी ने जब श्री हनुमानजी को उनका बल याद दिलाया था तब यही कहा था – “पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥” अर्थात हे पवनकुमार! आप पवन के पुत्र हैं और बल में पवन के समान हैं। आप बुद्धि-विवेक और विज्ञान के निधान हैं॥ सो इस नाते से उन्हें यहाँ पवनकुमार’ संबोधित किया। क्योंकि आगे उनसे बल, बुद्धि, विद्या आदि बहुत कुछ मांगना है और मांगा तो उसी से जा सकता है जो स्वयं उसका निधान हो। 

(२) प्रभु श्री हनुमानजी को शाप वश अपना बल विस्मरण हो जाता है एवं याद दिलाने पर ही याद आता है। ऐसा कहना बिलकुल भी अनुचित ना होगा कि श्री तुलसीदासजी ने भी प्रभु श्री हनुमानजी को सर्वप्रथम पवनकुमार’ संबोधित करके उनके बल का स्मरण कराया। श्रीरामचरितमानसजी में श्री तुलसीदासजी लिखते भी हैं – “प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन। जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥” अर्थात मैं पवनकुमार श्री हनुमानजी को प्रणाम करता हूँ, जो दुष्ट रूपी वन को भस्म करने के लिए अग्निरूप हैं, जो ज्ञान की घनमूर्ति हैं और जिनके हृदय रूपी भवन में प्रभु श्री रामजी धनुष-बाण धारण किए निवास करते हैं । 

(३) जहाँ भी कार्य में अति शीघ्रता का भाव दर्शाना हो वहाँ पवनकुमार’ (जो पवन की गति से कार्य कर सकें) को ही स्मरण करना पड़ता हैं और श्री तुलसीदासजी चाहते है कि प्रभु श्री हनुमानजी उन्हें बुद्धिहीन जानकर अतिशीघ्र उनका कल्याण करें।

(४) आप श्री पवनपुत्र हैं एवं पवन तन और मन दोनों को पावन कर देती है। तो श्री तुलसीदासजी स्वयं को बुद्धिहीन जनाकर पावन करने के लिए भी पवनकुमार’ का स्मरण करते हैं। 

(५) पवन देव भी है सो पवनकुमार’ यह संबोधन देकर आपका देव रूप में आव्हान करते हैं।

बल बुधि बिद्या देहु मोहिः श्री तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानसजी में लिखते है – “सो न होई बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर। करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर॥” अर्थात श्रीरघुबर के यश वर्णन का जो संकल्प मैंने लिया है उसके लिए मेरी बुद्धि एवं बल बहुत ही थोड़ा है। वे कहते है कि हे प्रभु श्री हनुमानजी आप बल, बुद्धि-विवेक और विज्ञान के निधान हैं सो मुझे भी बल, बुद्धि एवं विद्या दीजिए। बल से यहाँ आशय आत्मबल से है क्योंकि श्रीरघुबर का यश गाना कोई सरल कार्य नहीं है। बुद्धि इसलिए कि बुद्धि से कार्य को समझकर आत्मबल से उसे सिद्ध कर सकें। और विद्या इसलिए कि कितना भी बल और बुद्धि लगा लें अगर ज्ञान ही ना हुआ तो सब बेकार है। कोई शस्त्र चलाना हो तो बल होना चाहिए लेकिन कहाँ चलाना है इसके लिए बुद्धि होना चाहिए और बुद्धि जिसका उपयोग कर सकें ऐसी विद्या भी होनी चाहिए। विद्या कैसी होनी चाहिए – श्रीविष्णुपुराणजी का एक प्रसिद्ध श्लोक है- “सा विद्या या विमुक्तये”। अर्थात विद्या वही है, जो किसी व्यक्ति के मन को अज्ञानता के बंधन से मुक्ति दिलाए। और विद्या प्राप्त हो गई कैसे पहचानें तो “विद्या ददाति विनयं”, विनम्रता जीवन में आ जाए तो समझ सकते है कि विद्या आ गई है। इसलिए श्री तुलसीदासजी प्रभु श्री हनुमानजी से प्रार्थना कर रहे कि आप बल के भण्डार हैं “अतुलित बलधामं”, आप बुद्धि के भण्डार हैं “बुद्धिमतां वरिष्ठं” और आप विद्या के भण्डार हैं “ज्ञानिनां अग्रगण्यं”, तो “बल बुधि बिद्या देहु मोहि”, मुझे ये तीनों दे दीजिए। लेकिन फिर भी मन में संकोच था कि कहीं ऐसा न हो कि बल, बुद्धि, विद्या मिलने के बाद भी जीवन पूर्ववत ही बना रहे तो और क्या करें – “हरहु कलेस बिकार”।

कलेसः पतंजलि योगसूत्र में पाँच प्रकार के क्लेश (दुखों के मूल कारण) बताए गए हैं। यथा - अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः॥ अर्थात अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश - ये क्लेश हैं।

अविद्या: अज्ञानता या यथार्थ ज्ञान का अभाव या मिथ्या ज्ञान। मनुष्य अनित्य में नित्य, अस्थिर में स्थिर, दुःख में सुख, अपवित्र में पवित्र, अनात्मा में आत्मा का अनुभव करने लगता है। विद्या होगी तो अविद्या नहीं होगी। विनम्रता होगी तो अस्मिता नहीं होगी। 

अस्मिता: अहंकार या 'मैं' की भावना, खुद को केवल शरीर या मन मानना। 

रागः सुखद वस्तुओं या अनुभवों या विषयों के प्रति आसक्ति/आकर्षण। 

द्वेष: अप्रिय वस्तुओं या किसी के प्रति मन में छिपी शत्रुता, घृणा, जलन या बैर की भावना। 

अभिनिवेश: पंच क्लेशों में से अंतिम और सबसे गहरा क्लेश, जिसका अर्थ है ‘मृत्यु का भय’ या ‘जीवन के प्रति अत्यधिक आसक्ति’। 

ये पाँच प्रकार के क्लेश इंसान के मानसिक संतुलन को बिगाड़ते हैं और दुःख का कारण बनते हैं। वैराग्य होगा तो अभिनिवेश नहीं होगा और ज्ञान एवं वैराग्य दोनों होंगे तो न राग होगा न द्वेष होगा। अगर गहराई से सोचेंगे तो ये सभी किसी ना किसी रूप में हम सभी में होते हैं। श्रीरामचरितमानसजी में श्री काकभुशुण्डिजी श्री गरुड़जी से कहते हैं – “निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा॥” अर्थात हे पक्षीराज गरुड़! अब मैं आपसे अपना निजी अनुभव कहता हूँ। वह यह है कि भगवान के भजन किए बिना क्लेश दूर नहीं होते।  

बिकारः विकार वह हैं जो हमें भ्रष्ट करते हैं, मोह माया में लपेटते हैं। सामान्यतः ये किसी वस्तु, मन या शरीर की स्वाभाविक अवस्था में आने वाली खराबी या बीमारी (रोग/व्याधि) को दर्शाते है। इन्हें मानसिक शत्रु भी माना जाता है, जो मनुष्य के विवेक को नष्ट करते हैं। श्री तुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानसजी में प्रभु श्री रामजी के मुख से संतों के जो लक्षण बताए हैं, उसमें उन्हें छ: प्रकार के विकार को जीता हुआ कहा है। यथा – “सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊ॥ षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा॥” यह षट विकार हैं- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद (अभिमान) और मत्सर (ईर्ष्या/जलन की भावना)। काम अर्थात कामनाएं अनंत हैं, अगर पूरी ना हो तो क्रोध बढ़ता है और पूरी हो जाए तो लोभ बढ़ता है। एक ही कामना में व्यक्ति अटक जाए तो मोह हो जाता है और अनेक कामनाएं पूरी हो जाए तो मद हो जाता है। अपनी कामना पूरी ना हो पर दूसरे की हो जाए तो मत्सर हो जाता है, विकार ही विकार है, सब एक दूसरे से जुड़े हुए है और अपने पुरुषार्थ के बल पर इन क्लेशों एवं विकारों से मुक्त हो पाना, इनसे पार पा लेना किसी के लिए भी संभव ही नहीं है, यथा “ये माया तेरी बहुत कठिन हे राम”, सब जानते है कि गलत है पर इनसे जीत नहीं पाते। 

श्रीरामचरितमानसजी की फलश्रुति बताते हुए श्री तुलसीदासजी कहते है – “सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै। दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्री रघुबर हरै॥” अर्थात जो मनुष्य श्रीरामचरितमानसजी पाँच-सात चौपाइयों को भी मनोहर जानकर उनको हृदय में धारण कर लेता है, उसके भी पाँच प्रकार की अविद्याओं से उत्पन्न समस्त विकार एवं अविद्याजनित सारे क्लेश श्रीरघुबर हर लेते हैं। इसलिए श्री तुलसीदासजी प्रभु श्री हनुमानजी से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि आप मुझे बल, बुद्धि और विद्या इसलिए दीजिए कि मैं श्रीरघुबर के यश का वर्णन कर सकूं जो कि अविद्या से उत्पन्न समस्त क्लेशों एवं विकारों को हर लेता है। 

इस दोहे से जीवनोपयोगी शिक्षा हमें यह मिलती है कि हम भी जीवन में अगर ऐसी ही किसी परिस्थिति में फंस जाएं कि हर तरफ क्लेश एवं विकार ही दिखाई दें तो हमें भी प्रभु से यही मांगना चाहिए कि हे प्रभु! मैं बुद्धिहीन हूँ और तन से और मन से इस लायक नहीं कि इन क्लेशों और विकारों से पार पा सकूं, अतः आप ही कृपा करके मुझे इनसे मुक्ति हेतु बल, बुद्धि एवं विद्या प्रदान करें। भगवान से क्या मांगा जाए और कैसे मांगा जाए यही इस दोहे का मर्म है।