मंगलाचरण दोहा : श्रीगुरु चरन सरोज रज

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मन मुकुर सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायक फल चारि ॥

शब्दार्थः सरोज = कमल । रज = धूलि । निज = अपने । मुकुर = दर्पण, आईना, शीशा । बिमल = निर्मल, स्वच्छ । दायक = देने वाला । चारि = चार ।

अर्थः श्री गुरुदेव के चरणकमलों की रज से अपने मनरूपी दर्पण को पवित्र करके मैं रघुबर का निर्मल यश वर्णन करता हूँ जो (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन) चार फलों को देने वाला है ।

गूढ़ अर्थः गोस्वामी श्री तुलसीदासजी श्री हनुमान चालीसाजी की शुरुआत में सर्वप्रथम गुरुपदरज की वंदना करते है जिससे मन निर्मल हो एवं श्रीरघुबर के चरित मन में आवें एवं वे उसका वर्णन कर सकें । प्रभु तो स्वयं कहते है कि “निर्मल मन जन सो मोहि पावा” अर्थात मुझे केवल वही व्यक्ति प्राप्त कर सकता है जिसका मन पवित्र, छल-कपट रहित और निश्छल है। श्रीरामचरितमानसजी में अयोध्याकाण्ड के प्रारंभ में भी श्री तुलसीदासजी यही दोहा (श्रीगुरु चरन सरोज रज) लिखकर गुरुपदरज की शरण लेते है, क्योंकि वहाँ भी उन्हें भक्तचरित (श्री भरतजी) का वर्णन करना था और यहाँ भी उन्हें भक्तचरित (प्रभु श्री हनुमानजी) का ही वर्णन करना है, सो इसी दोहे का ज्यों-का-त्यों उपयोग यहाँ भी किया । वैसे भी प्रभु श्री हनुमानजी को कहते है कि “तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई” सो इस नाते भी दोनों के लिए एक ही दोहे का उपयोग करते है । श्री तुलसीदासजी ने इसके पूर्व यथानुपूर्वी श्रीदोहावली में भी श्रीरामचरितमानसजी के लगभग 85 से अधिक दोहों एवं सोरठों का उपयोग ज्यों-का-त्यों किया है।

श्रीगुरु चरन सरोज रजः श्रीरामचरितमानसजी के बालकाण्ड में जब श्रीरामयश कहना था तब श्री तुलसीदासजी ने गुरुपदरज से अपने विवेक नेत्रों को निर्मल किया था । जब भगवत् चरित वर्णन करने के लिए गुरुपदरज की शरण ली तो भक्त चरित तो अगम है एवं प्रभु श्री हनुमानजी भी श्री भरतजी की तरह भक्तशिरोमणि है । वहाँ विवेक नेत्रों को निर्मल किया था, यहाँ मन को । श्रीरघुबर का यश निर्मल है सो उसके वर्णन हेतु मन को निर्मल बनाया । श्री तुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानसजी अपने गुरुदेव से ही पाई है, यथा – “मैं पुनि निज गुरु सन सुनी कथा सो सुकरखेत” और उनके चरणकमलों का भी आपको बहुत बड़ा भरोसा है, इस हेतु भी गुरुपदरज का आश्रय लिया । श्री तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानसजी के आरंभ में कहते हैं कि गुरुदेव की जो चरन धूलि है ये अंजन है । यथा – गुरुपदरज मृदु मंजुल अंजन । नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन ॥ तेहि करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनौं रामचरित भवमोचन ॥ गुरुदेव की चरन रज अंजन है किन आँखों के लिए, बाहर की आँखों के लिए, नहीं, भीतर की आँखों के लिए और वे कौन सी है? श्री तुलसीदासजी कहते है “मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी”। ज्ञान और वैराग्य भीतर के दो नेत्र हैं । ज्ञान की आँख में द्वेष का मोतियाबिंद और वैराग्य की आँख में राग का मोतियाबिंद लग जाता है । तो जिनकी भीतर की आँखें खराब हो जाती है तो वह गुरुदेव के पदरजरूपी अंजन से ठीक हो जाती है । वैसे तो धूलि अगर आँख में गिर जाए तो आँखों को बंद कर देती है लेकिन वही धूलि जब गुरुदेव के चरणकमलों से जुड़ जाती है तो मन की आँखों को खोलने वाली बन जाती हैं, यही गुरुपदरज की महिमा है । ज्ञान और वैराग्य भीतर के दो नेत्र हैं तो दर्पण क्या है? अपना मन ही दर्पण है । तो भले ही ज्ञान हो वैराग्य भी हो पर दर्पण अर्थात मन मैला हो तो प्रभु प्राप्ति कठिन है। 

श्रीगुरु में गुरु के पहले श्री शब्द के प्रयोग का एक अर्थ संत यह भी लगाते है कि श्री तुलसीदासजी ने सर्वप्रथम भगवती माता जानकीजी का आव्हान किया, क्योंकि श्रीरघुबर का यश बिना श्री के आशीर्वाद के संभव ही नहीं । श्री तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानसजी में लिखते है “जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥ ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निर्मल मति पावउँ॥” भगवती माता जानकी श्रीरघुबर के चरित की विशेष मर्मज्ञा है क्योंकि वस्तुतः दोनों एक ही हैं, अतः माता और गुरुदेव दोनों की चरन रज से मन को सुधारने की बात श्री तुलसीदासजी करते है।

निज मन मुकुर सुधारिः कहते हैं जब दूसरों को देखना हो तो आँखें ठीक होनी चाहिए लेकिन जब खुद का प्रतिबिंब देखना हो तो केवल आँखों से काम नहीं चलता इसलिए आँखें तो ठीक हो ही साथ ही साथ दर्पण भी साफ सुथरा होना चाहिए । यह तो हुई सांसारिक दर्पण की बात, लेकिन जब श्रीरघुबर का एवं उनके निर्मल यश का प्रतिबिंब देखना हो तो यह मन के मुकुर (दर्पण) पर ही संभव है और वह मनरूपी दर्पण अगर मैला है तो यह संभव ही नहीं । मन का मैल क्या है तो मन का मैल तो विषय ही है । भोलेबाबा भी श्रीरामचरितमानसजी के बालकाण्ड में भगवती पार्वती माता को कथा सुनाने से पहले मन की मलिनता को दूर करने की बात कहते है । यथा – “काई विषय मुकुर मन लागी ।” एवं “मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना। राम रूप देखहिं किमि दीना॥” अर्थात जिनका मनरूपी दर्पण मैला है, उस पर काई जम गई है, तो वो बेचारा प्रभु श्री रामजी के रूप कैसे देख सकता है? इसीलिए श्री तुलसीदासजी भी पहले गुरुपद रज की महिमा बताते हुए कहते है कि “जन मन मंजु मुकुर मल हरनी ।” अर्थात गुरुदेव की पद रज भक्तों के मनरूपी सुंदर दर्पण के मैल को दूर करने वाली है सो उन्हीं से अपने मन को निर्मल करते है ताकि श्रीरघुबर के निर्मल यश को अपने मनरूपी दर्पण पर देख सकें एवं उनका वर्णन कर सकें। तो गुरुदेव की चरन धूलि दो काम करती है एक तो ज्ञान एवं वैराग्यरूपी आँखों के लिए अंजन है और वही चरन धूलि मनरूपी दर्पण पर डाल कर प्रेम के आंसुओं का जल गिराओ तो मन का दर्पण निर्मल हो जाएगा। इसीलिए श्री तुलसीदासजी कहते है कि श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मन मुकुर सुधारि । और क्यों सुधारुं ताकि -

“बरनउँ रघुबर बिमल जसु” श्रीरघुबर के निर्मल यश का वर्णन कर सकूं । अब मन में यह शंका आ सकती है कि श्री हनुमान चालीसाजी में तो प्रभु श्री हनुमानजी के यश का वर्णन होना चाहिए फिर श्री तुलसीदासजी श्रीरघुबर के यश का वर्णन करने का क्यों कह रहे हैं ? तो श्री तुलसीदासजी प्रभु श्री हनुमानजी का स्वभाव भलीभाँति जानते है कि कितना भी बुलाया जाए वे ऐसे आएंगे ही नहीं, उन्हें बुलाने का एक ही तरीका है कि श्रीरघुबर का यश गाया जाए और ऐसा करने पर तुरंत आ जाएंगे क्योंकि “यत्र यत्र रघुनाथ कीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्।” अर्थात जहाँ-जहाँ प्रभु श्री रघुनाथजी का कीर्तन होता है, वहाँ-वहाँ प्रभु श्री हनुमानजी मस्तक झुकाए हाथ जोड़कर उपस्थित रहते हैं एवं “राम चरित सुनिबे को रसिया” तो आप हैं ही ।

श्री तुलसीदासजी ने श्री हनुमान चालीसाजी की शुरुआत में श्रीरघुबर का ही यश गाने की बात क्यों की इस संदर्भ की एक कथा एक संत के मुख से सुनी है कि श्रीरामचरितमानसजी की रचना पूर्ण हो जाने के बाद एक रात प्रभु श्रीरामजी श्री तुलसीदासजी के स्वप्न में आए और कहा कि मेरे हनुमान के ऊपर भी एक श्रीग्रंथ लिखो। श्री तुलसीदासजी ने प्रभु की इच्छा को शिरोधार्य करते हुए अगले दिन जब लिखना प्रारंभ किया तो प्रभु श्री हनुमानजी महाराज वहाँ प्रकट हो गए और श्री तुलसीदासजी से कहा कि जिस लेखनी से मेरे प्रभु का गुणगान हुआ है उस लेखनी से दास का गुणगान नहीं होना चाहिए । श्री तुलसीदासजी असमंजस में पड़ गए एक तरफ प्रभु की आज्ञा है कि लिखो और इधर प्रभु श्री हनुमानजी मना कर रहे है। बहुत अनुनय विनय करने के बाद उन्होंने प्रभु श्री हनुमानजी को चालीसा के लिए मनाया कि प्रभु की इच्छा है तो मुझे कुछ तो आपके ऊपर लिखने दीजिए। उसमें भी प्रभु श्री हनुमानजी ने शर्त रखी कि इसमें भी मेरे प्रभु का ही गुणगान होना चाहिए। श्री तुलसीदासजी ने शर्त स्वीकार की तो प्रभु श्री हनुमानजी वहीं बैठ गए कि चालीसा लिखने में ज्यादा समय नहीं लगेगा, अगर कहीं मेरा गुणगान हुआ तो मैं गदा से जमीन पर प्रहार कर आपको सचेत करूंगा । श्री तुलसीदासजी ने प्रभु श्री रामजी के यश गान से लिखना प्रारंभ किया। जैसे ही प्रभु श्री रामजी का गुणगान होता प्रभु श्री हनुमानजी को समाधि लग जाती और श्री तुलसीदासजी तुरंत तीन-चार पद प्रभु श्री हनुमानजी पर लिख देते, फिर प्रभु श्री हनुमानजी जमीन पर गदा से प्रहार करते तो फिर प्रभु श्री रामजी पर पद लिख देते, फिर प्रभु श्री हनुमानजी को समाधि लग जाती, इस प्रकार श्रीरघुबर का यश गाने पर ही श्री हनुमान चालीसाजी की रचना हो पाई ।

श्रीरघुबर के अतिरिक्त प्रभु श्री हनुमानजी किंचित भी अपना अस्तित्व मानने को तैयार नहीं हैं । श्रीरघुबर के यशवर्णन में ही वे अपना यशवर्धन मानते हैं एवं उसी में प्रसन्न होते हैं। इसीलिए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने श्रीरघुबर का यश गाकर प्रभु श्री हनुमानजी को प्रसन्न किया एवं प्रभु श्री हनुमानजी का यश गाकर श्रीरघुबरजी को प्रसन्न किया । इस दोहे में रघुबर शब्द बहुत ही समर्थ है, इसमें प्रभु श्री रामजी एवं प्रभु श्री हनुमानजी दोनों का समान अंतर्भाव दिया है। आदि में रघुबर शब्द का उपयोग द्विविधा के कारण किया और प्रभु श्री रामजी का उत्कर्ष दिखाया एवं अंत में “राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप” लिखकर प्रभु श्री हनुमानजी का उत्कर्ष दिखाया । यह सब गुरुपदरज का प्रभाव है क्योंकि उसके बिना वाणी में ऐसा प्रभाव नहीं आ सकता। अगर प्रारंभ में गुरुदेव का मंगलाचरण ना किया होता तो यह रचना करना बहुत ही कठिन कार्य था ।

बिमल जसः श्री तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानसजी में प्रभु श्रीरामजी के निर्मल यश का वर्णन करते हुए लिखते है – “कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल। सादर सुनहिं जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल॥” अर्थात श्री रामचन्द्रजी का सुंदर यश कलियुग के पापों का नाश करने वाला, मन को दमन करने वाला और सुख का मूल है, जो लोग इसे आदरपूर्वक सुनते हैं, उन पर प्रभु श्री रामजी प्रसन्न रहते हैं और प्रभु श्री रामजी की प्रसन्नता में ही प्रभु श्री हनुमानजी की भी प्रसन्नता है । प्रभु श्री रामजी के निर्मल यश की विमलता इससे भी सिद्ध है कि यह यश वक्ता एवं श्रोता दोनों को चारों प्रकार के फल देने वाला है ।

जो दायक फल चारिः धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार फल देने वाला है और कैसे देने वाला है बिना किसी साधन के मात्र श्रवण एवं कीर्तन से । धर्म से आशय है वह कर्म जिसका करना किसी घटना, संबंध या गुणविशेष के विचार से उचित और जरूरी हो। अर्थ से आशय धन, धाम, ऐश्वर्य । श्रीमद् भागवतजी महापुराण के अनुसार छः प्रकार के अर्थ बताए गए है – स्वर्ग, ब्रह्मलोक, भूमण्डल का साम्राज्य, रसातल का आधिपत्य, योगसिद्धि एवं मोक्ष । भक्त इनमें से कुछ भी नहीं चाहता मोक्ष भी नहीं क्योंकि इनमें से किसी में भी परमानंद नहीं मिल सकता । भक्त का अर्थ केवल भगवान् हैं, वह सकलार्थरूप प्रभु श्री राम को ही चाहता है। काम से आशय है कामनाएँ । सामान्यतः वैषयिक सुख को काम कहते हैं पर अगर काम धर्म एवं अर्थ का विरोधी न हो तो उससे भी लोक परलोक सभी का नाश होता है। मोक्ष से आशय है जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा हो जाना । धर्म एवं अर्थ साधन है तथा काम एवं मोक्ष साध्य हैं। वैसे तो फल अंत में बताया जाता है पर यहाँ पहले ही दे दिया ऐसा क्यों? क्योंकि यहाँ प्रभु श्री हनुमानजी के चरित का वर्णन किया जाएगा और प्रभु श्री हनुमानजी भगवत् भक्त हैं और भगवत् भक्त का यश तुरंत फल देता है ।