अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥२॥
शब्दार्थः दूत = संदेशवाहक, प्रतिनिधि। अतुलित = जिसकी तुलना संभव नहीं हो, जिसे तोला न जा सकें। धाम = ईश्वर का निवास स्थान, तीर्थ ।
अर्थः हे पवनसुत अंजनीनंदन! श्रीरामदूत! आपके समान, दूसरा कोई बलवान नहीं है ।
गूढ़ अर्थः प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु श्री रामजी के दूत हैं और अतुलित बल के धाम हैं। श्री तुलसीदासजी ने प्रभु श्री हनुमानजी को पहले प्रभु श्री रामजी का दूत कहा फिर अतुलित बल का धाम कहा अगर पहले बलशाली कहकर फिर दूत कहते तो यह संदेह हो जाता कि प्रभु श्री हनुमानजी अति बलवान थे इसलिए दूत बना लिया। दूत या संदेशवाहक जब किसी के पास संदेश लेकर जाता है तो संदेश भी अपने स्वामी का ही लेकर जाता है और बल भी अपने स्वामी का ही लेकर जाता है और जिनके स्वामी स्वयं प्रभु श्री रघुनाथजी हों उनका अतुलित बल का धाम हो जाना स्वाभाविक ही है। दूत केवल वही हो सकता है जिसका अपना कोई अहंकार, अपना कोई मान नहीं, उसके स्वामी का मान ही उसका मान है। तो प्रभु श्री हनुमानजी ने अपने मान का हनन कर लिया इसलिए “रामदूत” बनें और श्रीरामदूत बनें इससे ही अतुलित बल के धाम बनें।
रामदूतः श्री तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानसजी के किष्किंधाकाण्ड में लिखते हैं – “पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा॥ परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी॥” जब भगवती सीता माता की खोज में वानर दल एक-एक करके प्रभु का आशीर्वाद लेकर अपनी-अपनी निर्धारित दिशाओं में जाने लगे तो सबसे अंत में प्रभु श्री रामजी को प्रणाम करने प्रभु श्री हनुमानजी आए। कार्य का विचार करके प्रभु ने उन्हें अपने पास बुलाया। प्रभु ने अपने करकमल से उनके सिर का स्पर्श किया तथा अपना सेवक जानकर उन्हें अपने हाथ की अँगूठी उतारकर दी और कहा कि “बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु॥” प्रभु ने संदेश दिया कि बहुत प्रकार से सीता को समझाना और मेरा बल तथा विरह (प्रेम) कहकर तुम शीघ्र लौट आना। प्रभु श्री रामजी का संदेश मिलते ही प्रभु श्री हनुमानजी चल पड़े क्योंकि “रामकाज करिबे को आतुर” एवं “रामकाज किन्हें बिनु मोहि कहां विश्राम”। और कैसे चल पड़े – “बार-बार रघुबीर सँभारी, तरकेउ पवनतनय बल भारी” अर्थात बारंबार श्रीरघुबीर का स्मरण करते हुए चले कि कहीं अभिमान न आ जाए।
प्रभु श्री हनुमानजी इतने अहंशून्य है कि उन्होंने “रामदूत” होने को ही अपनी पहचान बना लिया। जब वे लंका में भगवती सीता माता के पास अशोक वाटिका में पहुँचे और माता ने परिचय पूछा तो कहा कि – “राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥” प्रभु श्री भोलेबाबा भगवती माता पार्वतीजी को प्रभु श्री हनुमानजी की पूंछ अग्नि से न जल पाने का कारण बताते हुए कहते हैं – “ताकर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥” अर्थात हे पार्वती! जिन्होंने अग्नि को बनाया, हनुमानजी उन्हीं के दूत हैं। इसी कारण वे अग्नि से नहीं जले। जब रावण ने प्रभु श्री हनुमानजी से पूछा कि वे कौन हैं और किसके बल पर उन्होंने लंका उजाड़ी तब भी प्रभु श्री हनुमानजी ने कहा था – “जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। तास दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥” अर्थात जिनके लेशमात्र बल से तुमने समस्त चराचर जगत को जीत लिया और जिनकी प्रिय पत्नी को तुम हर लाए हो, मैं उन्हीं का दूत हूँ। प्रभु श्री हनुमानजी स्वयं को “रामदूत” कहते है और यह नाम उन्हें सर्वाधिक प्रिय है, इसलिए श्री तुलसीदासजी भी कहते हैं कि “राम दूत अतुलित बल धामा”।
अतुलित बल धामाः पिछली चौपाई में हमने श्रीरामचरितमानसजी के सुंदरकाण्ड के मंगलाचरण का श्लोक देखा था –
अतुलितबलधामं स्वर्णशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥
इस श्लोकानुसार प्रभु श्री हनुमानजी को पहला विशेषण गोस्वामी श्री तुलसीदासजी “अतुलितबलधामं” का देते है, अर्थात आप अतुलित बल के धाम हैं, अतुलित अर्थात जिसकी कोई तुलना ही न हो, जिसे तोला ही न जा सकें। धाम कहते हैं निवास को सो यह कहना ज्यादा उचित होगा कि आपके अंदर अतुलित बल निवास करता है। और प्रभु श्री हनुमानजी के हृदय में कौन निवास करता है – श्रीरामचरितमानसजी में श्री तुलसीदासजी लिखते हैं – “प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन। जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥” अर्थात मैं पवनकुमार श्री हनुमानजी को प्रणाम करता हूँ, जिनके हृदयरूपी भवन में प्रभु श्री रामजी धनुष-बाण धारण किए निवास करते हैं । और प्रभु श्री रामजी का बल कैसा है – “अतुलित बल अतुलित प्रभुताई।” अर्थात जिनका बल, प्रताप और सामर्थ्य अतुलनीय है, वे प्रभु श्री रामजी हैं और वे अतुलित बलवान प्रभु श्री रामजी जिनके हृदय में निवास करते हैं वे प्रभु श्री हनुमानजी हैं।
प्रभु श्री हनुमानजी का बल अपार है। आपके पूरे बल का वर्णन कर पाना तो दूर उसके लेशमात्र का वर्णन कर पाना भी असंभव है। एक संत से सुना हुआ प्रसंग है कि दस हजार हाथियों में जितना बल होता है उतना बल एक दिग्गज (दिशाओं के हाथी) में होता है, दस हजार दिग्गजों में जितना बल होता है उतना बल एक ऐरावत (इन्द्रदेव का हाथी) में होता है, दस हजार ऐरावतों में जितना बल होता है, उतना बल एक इन्द्रदेव में होता है और दस हजार इन्द्रदेवों में जितना बल होता है उतना बल प्रभु श्री हनुमानजी की छोटी ऊँगली के नख के अग्रभाग में होता है। इसीलिए प्रभु श्री हनुमानजी का बल अतुलनीय है।
श्रीरामचरितमानसजी के लंकाकाण्ड में कथा आती है कि रावण ने प्रभु श्री ब्रह्माजी द्वारा प्रदान शक्ति से जब प्रभु श्री लक्ष्मणजी पर प्रहार किया तो वे मूर्छित हो गए, रावण ने उनको उठाकर ले जाने का प्रयास किया पर वह उन्हें हिला भी न सका। तब प्रभु श्री हनुमानजी वहाँ आते हैं और रावण को ललकारते हैं, रावण कहता है लंबा युद्ध नहीं, एक-एक घूँसे का युद्ध करते हैं तो प्रभु श्री हनुमानजी कहते हैं ठीक है पहले तुम प्रहार करो। रावण ने कहा ऐसा क्यों तो प्रभु श्री हनुमानजी कहते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि हमारा घूँसा खाकर तुम प्रहार करने लायक ही न रहो। रावण ने अपना संपूर्ण बल लगाकर अत्यंत भयंकर घूँसे का एक प्रहार किया लेकिन “जानु टेकि कपि भूमि न गिरा।” प्रभु श्री हनुमान्जी घुटने टेककर रह गए, पृथ्वी पर गिरे नहीं। अब प्रभु श्री हनुमानजी की बारी थी। प्रभु श्री हनुमानजी ने मारने को भुजा उठाई तो प्रभु श्री ब्रह्माजी एवं प्रभु श्री महादेवजी हाथ जोड़कर प्रकट हो गए कि कहीं आपने पूरी शक्ति से प्रहार कर दिया तो रावण के प्राण निकल जाएंगे। प्रभु श्री हनुमान्जी ने रावण को केवल एक सामान्य घूँसा मारा। वह ऐसे गिर पड़ा जैसे वज्र की मार से पर्वत गिरा हो। मूर्च्छा भंग होने पर रावण जागा और प्रभु श्री हनुमानजी के बड़े भारी बल को सराहने लगा। प्रभु श्री हनुमानजी बोले बल तो प्रभु श्री ब्रह्माजी एवं प्रभु श्री महादेवजी ने दिखाने नहीं दिया, बल तो तब होता जब उसका बखान करने को तुम जीवित न होते। प्रभु श्री लक्ष्मणजी को उठाकर प्रभु श्री हनुमान्जी प्रभु श्री रघुनाथजी के पास ले आए, रावण आश्चर्य से उन्हें देखता रह गया क्योंकि रावण प्रभु श्री लक्ष्मणजी को हिला भी न पाया था। तो प्रभु श्री हनुमानजी का परिचय “रामदूत” के रूप में है और महिमा अतुलित बल धाम के रूप में है। इसलिए श्री तुलसीदासजी लिखते है “राम दूत अतुलित बल धामा”।
जब भगवती सीता माता की खोज के लिए समुद्र पार करना था तो सबने अपना बल सुनाया – “निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा॥” पर प्रभु श्री हनुमानजी कुछ नहीं बोले। सबने कहा आप भी अपना बल बताइए तो प्रभु श्री हनुमानजी बोले हमारा कुछ हो तो हम बताएं, हमारे पास तो जो कुछ भी है वो हमारे प्रभु का ही है। प्रभु श्री हनुमानजी स्वयं बड़े-बड़े कार्य करने के बाद भी विनम्रतापूर्वक प्रभु श्री रामजी से कहते हैं – “सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥” अर्थात यह सब तो हे श्री रघुनाथजी! आप ही का प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी प्रभुता कुछ भी नहीं है। भगवती सीता माता से भी जब अशोक वाटिका में मिले थे तो स्वयं का बल कहते हुए कहा था – “सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥” अर्थात हे माता! वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती, लेकिन प्रभु कृपा के प्रताप से एक छोटा सर्प भी गरुड़ पक्षी को खा सकता है अर्थात अत्यंत निर्बल भी महान बलवान को मार सकता है।
प्रभु श्री हनुमानजी अतुलितबलधामं होने के बाद भी अत्यंत विनम्र हैं और कभी अपने बल का अहंकार नहीं रखते, हमें भी जीवन में ध्यान रखना चाहिए कि अगर थोड़ा भी अपबल, तपबल, धनबल, बाहुबल आ जाए तो उसे प्रभु की कृपा मानना चाहिए न कि अपना पुरुषार्थ। श्री सूरदासजी के एक प्रसिद्ध भजन के बोल हैं – “जब लगि गज बल अपनो बरत्यो, नेक सरयो नहीं काम, निर्बल ह्वै बल राम पुकार्यो, आए आधे नाम। सुने री मैंने निर्बल के बल राम॥”
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामाः आप भगवती अंजनी माता के पुत्र हैं और “पवनसुत” नाम से जाने जाते हैं। भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से ही संतान को माता के नाम से भी बुलाने की परंपरा रही है, यथा कौशल्यानंदन, देवकीनंदन, कुंतीपुत्र, यशोदानंदन इत्यादि। अतः भगवती अंजनी माता के पुत्र होने से आप “अंजनी-पुत्र” या “अंजनीनंदन” नाम से भी प्रसिद्ध हुए। प्रभु श्री हनुमानजी के जन्म की कथा श्री जामवन्तजी ने प्रभु श्री हनुमानजी को ही उनका बल याद दिलाते समय सुनाई थी, जिसका वर्णन विस्तार से श्री वाल्मिकीय सर्ग ६६ व ६७ के करीब १० श्लोकों में आता है। संक्षेप में कथा कुछ इस प्रकार है -
भगवती अंजनी माता पूर्व जन्म मे पुंजिकस्थला नाम की एक अप्सरा थी। एक ऋषि के शापवश उन्होंने वानरी के रूप में कुंजर नाम के वानर के यहाँ जन्म लिया फिर वानरराज श्री केसरीजी से आपका विवाह हुआ। श्री मतंग ऋषि की प्रेरणा से आपने रुद्र के समान पुत्र प्राप्ति हेतु वर्षों तक कठोर तप किया और केवल वायु पर ही जीवित रहीं । प्रभु श्री हनुमानजी अतुलित बल को धारण किए हुए हैं। ऐसे अतुलितबलधामं, ज्ञानिनां अग्रगण्यं का शिशु रूप में जन्म किसी साधारण माता से होना संभव नहीं। भगवती अंजनी माता कई जन्मों के कड़े तप के प्रभाव से युक्त थीं, उनकी पवित्र कोख ही ऐसे तेजस्वी बालक को धारण करने का सामर्थ्य रख सकती थीं। प्रभु श्री शंकरजी के तेज को श्री पवनदेव ने श्रवण मार्ग से तपोनिष्ठ भगवती अंजनी माता के गर्भ में स्थापित किया और उन्हीं से प्रभु श्री हनुमानजी का जन्म हुआ। पवन वस्तुतः संपूर्ण प्राणियों के अन्तःस्थ हैं तथा प्रत्येक वस्तु की स्वीकार्यता एवं त्याग में वे ही कारण हैं। श्री पवनदेवजी की कृपा से महाबलशाली, महापराक्रमी, महातेजस्वी पुत्र की प्राप्ति भगवती अंजना माता को हुई इसलिए उन्हें पवनसुत नाम से भी जाना जाता है।
भगवती सीता माता की खोज के लिए जब कोई भी समुद्र लाँघकर वापस आने योग्य नहीं मिलता तब श्री जामवन्तजी पहले प्रभु श्री हनुमानजी के जन्म की कथा उन्हें सुनाते हैं, फिर उन्हें उनका बल याद दिलाते है - “पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥” अर्थात हे पवनकुमार! आप पवन के पुत्र हैं और आप बुद्धि-विवेक और विज्ञान के निधान हैं। आप बल और वेग में पवन के समान हैं। वायु ही प्राण हैं और हम सबके प्राण जा रहें हैं सो तुम इस सागर को लाँघकर हम सबके प्राणों की रक्षा करो। यथा “कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥” श्री जामवन्तजी पहले जन्म की कथा याद दिलाते हैं परंतु प्रभु श्री हनुमानजी शांत रहते हैं, फिर श्री जामवन्तजी बल की याद दिलाते हैं तो भी प्रभु श्री हनुमानजी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन जैसे ही श्री जामवन्तजी कहते हैं कि “राम काज लगि तव अवतारा” जैसे ही प्रभु श्री हनुमानजी ने सुना कि आपका अवतार श्रीरामकाज के लिए हुआ है, तुरंत उठ खड़े हुए और पर्वताकार हो गए।
जो भाव श्री जामवन्तजी उपरोक्त संवाद में प्रभु श्री हनुमानजी से कहते हैं वही सारी बातें श्री तुलसीदासजी इस चौपाई में प्रभु श्री हनुमानजी से कहते हैं बस एक परिवर्तन कर देते हैं कि श्री जामवन्तजी ने पहले जन्म कहा फिर बल कहा और फिर श्रीरामकाज कहा और श्री तुलसीदासजी पहले ही “रामदूत” कहकर श्रीरामकाज कह देते हैं फिर “अतुलित बल धामा” कहकर बल और फिर “अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा” कहकर जन्म की कथा याद दिलाते हैं।
चौपाई १ः जय हनुमान ज्ञान गुन सागर
अगली चौपाईः Will be Posted on Sunday, April 5, 2026