महाबीर बिक्रम बजरंगी ।
कुमति निवार सुमति के संगी ॥३॥
शब्दार्थः महाबीर = अत्यंत पराक्रमी। बिक्रम = साहस और शौर्य से भरपूर, विशेष पराक्रम संपन्न। बजरंगी = वज्र के समान मजबूत शरीर वाले। निवार = दूर करने वाले। संगी = सहायक।
अर्थः हे महावीर बजरंगबली! आप विशेष पराक्रम वाले हैं। आप कुबुद्धि को दूर करते हैं, और अच्छी बुद्धि वालों के सहायक हैं।
गूढ़ अर्थः गोस्वामी श्री तुलसीदासजी इस चौपाई में प्रभु श्री हनुमानजी को 'महाबीर', 'बिक्रम' और 'बजरंगी' तीन वीरतापूर्ण नामों से संबोधित करते हुए कहते हैं कि आप कुमति को दूर करते हैं और सुमति का संग कराते हैं। स्पष्ट है कि वीरता केवल शारीरिक नहीं होती, उससे कहीं आगे जाकर मानसिक स्तर पर वीरता दिखाने वाला ही 'महाबीर' हो सकता है।
महाबीरः जो बलशाली हो और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे उसे वीर कहते हैं, पर वीर केवल बाहरी शत्रुओं पर ही विजय प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन प्रभु श्री हनुमानजी बाहरी तथा भीतरी दोनों प्रकार के शत्रुओं का दमन करते हैं, इसलिए वे केवल वीर नहीं 'महाबीर' हैं। प्रभु श्री रामजी को 'रघुबीर' नाम से भी संबोधित किया जाता है क्योंकि वे पंचवीरतायुक्त हैं, यथा विद्यावीर, दानवीर, दयावीर, पराक्रमवीर एवं महावीर। और ऐसे पंचवीरतायुक्त प्रभु श्रीरघुबीर जिनके हृदय में धनुष-बाण धारण किए निवास करते हैं, यथा “जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर” वे प्रभु श्री हनुमानजी तो नैसर्गिक रूप से 'महाबीर' हैं। वैसे भी प्रभु श्री हनुमानजी तो स्वयं कहते हैं कि मेरा अपना कोई बल नहीं, मेरे पास तो जो भी है सब प्रभु का ही है।
श्रीरामचरितमानसजी में गोस्वामी श्री तुलसीदासजी लिखते हैं – “महाबीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना॥” अर्थात मैं उन महावीर प्रभु श्री हनुमानजी की वंदना करता हूँ जिनकी यशगाथा का गान स्वयं मर्यादा-पुरुषोत्तम प्रभु श्री रामचन्द्रजी ने अनेकों बार किया है। लंका में जाकर अकेले ही सब राक्षसों से लड़कर लंका दहन कर आए, एक रात में पूरा द्रोणाचल पर्वत उठाकर लंका ले आए, रावण-कुंभकर्ण इनके घूँसे को याद करते थे, आपका बल, वीरता देखकर विधि-हरि-हर भी चौंक उठते थे। श्रीरामचरितमानसजी के सुंदरकाण्ड एवं लंकाकाण्ड भर में प्रभु श्री हनुमानजी की वीरता के प्रसंग ठौर-ठौर पर हैं।
संपूर्ण श्रीरामचरितमानसजी में अगर किसी बलवान को ढूंढा जाए तो वह रावण है, जिसने समस्त देवताओं, दिक्पालों को बंदी बना लिया, कैलाश पर्वत को हिला दिया, जिसके चलने से धरती डोलने लगती थी, लेकिन उस रावण को वानरराज बालि ने छः महीने कांख में दबाए रखा, उन वानरराज बालि को प्रभु श्री रामजी ने एक बाण से मार दिया, और उन प्रभु श्री रामजी को प्रभु श्री हनुमानजी ने पवित्र 'श्रीराम' नाम का जाप करके अपने बस में कर रखा हैं, यथा “सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥” तो इस प्रकार भी प्रभु श्री हनुमानजी 'महाबीर' हुए जिनके हृदय में वीरों के वीर श्रीरघुबीर निवास करते हैं। इसलिए श्री तुलसीदासजी आगे श्री हनुमान चालीसाजी में लिखते हैं –“भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै॥” अर्थात आपका यह नाम 'महाबीर' सुनकर भूत पिशाच आस-पास भी नहीं आते।
बिक्रमः प्रभु श्री हनुमानजी विशेष पराक्रमी हैं। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड सर्ग ३५ में श्रीरघुनाथजी महर्षि अगस्त्यजी से प्रभु श्री हनुमानजी के विशेष पराक्रम का बखान करते हुए एवं उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहते हैं – “न कालस्य न शक्रस्य न विष्णोर्वित्तपस्य च । कर्माणि तानि श्रूयन्ते यानि युद्धे हनूमतः॥” अर्थात प्रभु श्री हनुमानजी ने युद्ध में जो अदभुत और विशेष पराक्रमी कर्म किए, वैसे कर्म न तो काल, न इन्द्र, न देवता और न ही कुबेर के सुने गए हैं। श्रीरामचरितमानसजी के सुंदरकाण्ड में वर्णित नागमाता सुरसा के प्रसंग में पभु श्री हनुमानजी का विशेष पराक्रम उल्लेखनीय है, यथा “जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥” अर्थात जैसे-जैसे सुरसा मुख का विस्तार बढ़ाती थी, प्रभु श्री हनुमानजी उसका दोगुना रूप दिखाते थे। जैसे ही सुरसा ने सौ योजन (चार सौ कोस का) मुख किया, तुरंत ही प्रभु श्री हनुमानजी ने बहुत ही छोटा रूप धारण कर लिया। प्रभु श्री हनुमानजी केवल 'महाबीर' ही नहीं विद्यावान भी हैं, गुणी भी हैं, चातुर भी हैं और श्री रामकाज करने को आतुर भी हैं, उनके इन्हीं सभी गुणों का संयोजन उन्हें 'बिक्रम' अर्थात विशेष पराक्रमी बनाता है।
बजरंगीः श्री हनुमान चालीसाजी की प्रथम चौपाई में हम 'हनुमान' नाम की कथा देख चुके हैं, जिसके अनुसार बालपन में सूर्योदय के समय आप बालरवि को लाल फल समझकर खाने को लपकें। देवराज इन्द्र ने विस्मित होकर आप पर वज्र का प्रहार कर दिया, पर आपका कुछ नहीं बिगड़ा। उल्टा प्रभु श्री हनुमानजी की ठोड़ी की चोट से इन्द्र के कठोर वज्र का भी अहंकार चूर-चूर हो गया, यथा “जाकी चिबुक चोट चूरन किय रद-मद कुलिस कठोरको”(श्री विनय पत्रिका)। श्री पवनदेव को जैसे ही पता चला कि देवराज इन्द्र ने उनके पुत्र पर वज्र का प्रहार कर दिया है, उन्होंने वायु का संचार रोक दिया। तब प्रभु श्रीब्रह्माजी ने उन्हें ऐसा न करने और प्राणवायु का संचार आरंभ करने को कहा। इस पर श्री पवनदेव ने अपने पुत्र पर अनुग्रह करने की प्रार्थना की। तब प्रभु श्रीब्रह्माजी ने बालक मारुति को स्वस्थ कर दिया और उनके आदेश पर लगभग सभी प्रमुख देवताओं ने उन्हें कुछ-ना-कुछ वरदान दिए। तब श्री इंद्रदेवजी ने उन्हें ये वरदान दिया था कि उनका शरीर वज्र के समान हो जाएगा और उन पर किसी अस्त्र-शस्त्र का कोई असर नहीं होगा। तभी से उनका एक नाम 'वज्रांग' अर्थात वज्र के समान अंगों वाला पड़ गया। श्री तुलसीदासजी ने जब अवधी भाषा में श्रीरामचरितमानसजी लिखी तब उन्होंने ही पहली बार वज्रांग को अवधी भाषा में 'बजरंग' लिखा। और इसी कारण प्रभु श्री हनुमानजी का एक नाम 'बजरंग बली' भी प्रसिद्ध हुआ जिसका अर्थ होता है वज्र के समान कठोर एवं बलवान।
कुमति निवार सुमति के संगीः मति दो प्रकार की होती है – कुमति (बुरी बुद्धि) और सुमति (अच्छी बुद्धि)। श्रीमद् भगवद् गीताजी में प्रभु सुमति का अर्थ बताते हुए कहते हैं- “प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥” अर्थात हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है। सात्त्विकी बुद्धि ही सुमति है और राजसी बुद्धि कुमति। कुमति दो प्रकार की होती है – राजसी और तामसी। राजसी में कार्य-अकार्य धर्म-अधर्म का यथार्थ ज्ञान नहीं रहता और तामसी में ज्ञान तो होता है लेकिन विपरीत। इसमें व्यक्ति अधर्म को ही धर्म मान लेता है।
प्रभु श्री हनुमानजी कुमति को दूर करने वाले एवं सुमति का संग कराने वाले हैं। सुमति और कुमति हम सभी में होती हैं, भले ही प्रकट में दिखाई नहीं देती, लेकिन भीतर ही छिपी रहती है। श्रीरामचरितमानसजी के सुंदरकाण्ड में रावण को समझाते हुए श्री विभीषणजी कहते हैं “सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥ जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥” अर्थात हे नाथ! वेद और पुराण ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) और कुबुद्धि (बुरी बुद्धि) सबके हृदय में रहती है, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकार की संपदाएँ रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है वहाँ विपत्ति-ही-विपत्ति रहती है। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि ऐसा नहीं कहा गया कि सुमति और कुमति किसी-किसी के हृदय में रहती हैं, बल्कि ये दोनों प्रकार की बुद्धि सबके हृदय में बताई गई हैं। संसार में ऐसा कोई नहीं जिसमें सुमति न हो या जिसमें कुमति न हो।
जैसे कभी रात आती है कभी दिन आता है, कभी सुख आता है और कभी दुःख आता है, वैसे ही कभी सुमति प्रबल होती है और कभी कुमति प्रबल होती है। संग करना मानव का स्वभाव है और यह तय है कि हम किसी-न-किसी का तो संग करेंगे ही। हम जैसे व्यक्ति का संग करते हैं हमारी वही मति प्रबल हो जाती है, अच्छे का संग करते हैं तो सुमति प्रबल हो जाती है और बुरे का संग करते हैं तो कुमति प्रबल हो जाती है। तो फिर कैसे पहचाना जाए कि अभी हमारे अंदर कौन-सी मति प्रबल है। इसकी पहचान भी श्री विभीषणजी अगली पंक्ति में बता देते हैं, यथा “तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥” अर्थात हे नाथ! आपके हृदय में कुमति आ बसी है। इसी से आप हित को अहित और शत्रु को मित्र मान रहे हैं। बड़ी सरल पहचान है कि जब अपने हितैषी एवं भला चाहने वाले शत्रु लगने लगे और अहित करने वाले मित्र लगने लग जाए तब पक्का मानिए कि इस समय व्यक्ति की कुमति प्रबल है और विपत्तियों के आने का समय आ गया है। ऐसी दशा में आमतौर पर व्यक्ति की सोचने समझने की शक्ति खत्म हो जाती है।
जरा सोचिए रावण को कितने लोगों ने समझाया, प्रभु श्री हनुमानजी ने समझाया, भगवती मंदोदरीजी ने समझाया, श्री विभीषणजी ने समझाया, कुंभकर्ण ने समझाया, माल्यवंत ने समझाया, मारीच ने समझाया, श्री अंगदजी ने समझाया लेकिन जब कुमति प्रबल हो तो हित की बात भी उपदेश ही लगती है, जैसे रावण को लगी, यथा “जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥ बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥”
प्रभु श्री हनुमानजी कुमति का निवारण करके सुमति का संग करा देते हैं। यह प्रभु श्री हनुमानजी का सामर्थ्य तो है ही साथ ही साथ स्वभाव भी है। किष्किंधा में थे तो कुमतिरूपी बालि को दूर किया और सुमतिरूपी श्री सुग्रीवजी का संग किया, लंका गए तो कुमतिरूपी रावण का तो निवारण कर दिया और सुमतिरूपी श्री विभिषणजी का संग किया। एक शंका आ सकती है कि क्या ऐसा भी किसी का सामर्थ्य हो सकता है तो श्री तुलसीदासजी इसका उत्तर श्री विनय पत्रिका में दे देते हैं – “अघटित-घटन, सुघट-बिघटन, ऐसी बिरूदावलि नहिं आनकी” अर्थात जो न घटने वाली घटना को घटा दे और जो घटना घटने वाली हो उसे विघटित कर दे ऐसी सामर्थ्य प्रभु श्री हनुमानजी की है। इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी कुमति निवार सुमति के संगी हैं।
श्री हनुमान चालीसाजी के मंगलाचरण के प्रथम दोहे में हमने देखा था कि गोस्वामी श्री तुलसीदासजी सर्वप्रथम गुरुपदरज की वंदना करते है जिससे मन निर्मल हो एवं श्रीरघुबर के चरित मन में आवें एवं वे उसका वर्णन कर सकें। श्रीरघुबर के चरित को समझने के लिए सुमति का प्रबल होना बहुत जरूरी है क्योंकि श्री तुलसीदासजी स्वयं लिखते हैं – “अति बिचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान। जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन॥” अर्थात श्रीरघुनाथजी का चरित्र बड़ा ही विचित्र है, उसको परम सुजान ही जान पाते हैं और जो मंदबुद्धि हैं, वे तो मोह के वश होकर हृदय में कुछ दूसरी ही बात समझ बैठते हैं। जब कुमति प्रबल होती है तो व्यक्ति मतिमंद होता चला जाता है और जब सुमति प्रबल होती है तो व्यक्ति परम सुजान होता चला जाता है। तो श्री तुलसीदासजी इस चौपाई में स्पष्ट संकेत करते है कि संग किसका करना चाहिए, अर्थात अगर हम “महाबीर बिक्रम बजरंगी” अर्थात प्रभु श्री हनुमानजी का संग करेंगे, उनकी शरण लेंगे तो उनकी कृपा से, उनके प्रभाव से हम स्वमेव मंदमति से परम सुजान तक की यात्रा पूरी कर लेंगे और श्रीरघुबर के विचित्र चरित्र को सहज ही में जानने योग्य बन जाएंगे। प्रभु श्री हनुमानजी हमारी कुमति का निवारण करके सुमति का संग करा देंगे, यही उनकी महिमा है और इस चौपाई का मर्म भी।