कंचन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुंडल कुंचित केसा ॥४॥
शब्दार्थः कंचन = सोना, स्वर्ण। बरन = वर्ण, रंग। बिराज = शोभायमान। सुबेसा = सुन्दर वेष। कुंडल = कान की बाली, कान का आभूषण। कुंचित = घुंघराले। केसा = बाल, केश।
अर्थः आपका वर्ण स्वर्णिम (सोने के समान) है और आप सुन्दर वेष में सुशोभित हैं । आपके केश घुंघराले हैं तथा आपके कानों में कुंडल शोभायमान हो रहे हैं ।
गूढ़ अर्थः इस चौपाई में गोस्वामी श्री तुलसीदासजी प्रभु श्री हनुमानजी के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि आपका वर्ण कंचन अर्थात सोने के रंग का है। प्रभु श्री हनुमानजी को हमने परिस्थितिवश विभिन्न स्वरूप धारण करते देखा है। जब लंका में प्रवेश करना था तो “मसक समान रूप कपि धरी” मच्छर के समान छोटा-सा रूप धारण कर लिया। अशोक वाटिका में भगवती सीता माता के सामने आना था तो “सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा”, राक्षसों का संहार करना था तो “भीम रूप धरि असुर संहारे”। बार-बार रूप बदलना आपके परिस्थितिजन्य बौद्धिक कौशल को दर्शाता है। एक शंका मन में आ सकती है कि आखिर प्रभु श्री हनुमानजी का वास्तविक स्वरूप है कैसा? वे दिखते कैसे हैं?
कंचन बरनः गोस्वामी श्री तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानसजी के सुंदरकाण्ड के मंगलाचरण में प्रभु श्री हनुमानजी की वंदना करते हुए आपको ‘स्वर्णशैलाभदेहं’ कहते हैं। अर्थात आपकी देह तप्तकांचन है, सुमेरु पर्वत के समान विशाल है और दहकती हुई अग्नि की कान्ति के समान दैदीप्यमान है। भगवती सीता माता ने प्रभु से स्वर्ण मृग मांगा था लेकिन वह तो मायावी था। प्रभु श्री हनुमानजी भी कंचनवर्ण साखामृग है। दोनों में से कौन असली हैं इसकी परीक्षा कैसे हो। असली स्वर्ण की परीक्षा तो केवल अग्नि से ही संभव है। नकली स्वर्ण मृग का रूप लिए हुए मायावी मारीच तो श्रीरघुबर के अग्निरूपी बाण में जलकर नष्ट हो गया और कंचनवर्ण साखामृग प्रभु श्री हनुमानजी लंका का दहन करके सकुशल लौट आए। ‘स्वर्णशैलाभदेहं’ का एक भाव यह भी है कि सोना अग्नि में नहीं जलता और न ही किसी विकार को प्राप्त होता है, वरन अग्नि के संग से और निखर कर कुंदन हो जाता है। अर्थात जब आपने लंका को जलाया तो स्वयं नहीं जले बल्कि आपका तेज और कान्ति और बढ़ गई।
प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु श्री रामजी की सेवा के लिए वानर देह धारण की थी, जिसमें कंचन वर्ण, कानों में कुंडल, कुंचित केश, सुंदर वेष आदि की संगत नहीं हो पाती। वे तो स्वयं श्री विभीषणजी से अपने बारे में कहते हैं कि – “कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥ प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥” लेकिन प्रभु श्री हनुमानजी का वानर देह के अतिरिक्त भी एक मूल स्वरूप है। श्रीरामचरितमानसजी के सुंदरकाण्ड में दो बार वर्णन आता है जब प्रभु श्री हनुमानजी अपना मूल स्वरूप दिखाते हैं।
प्रथम बार जब समुद्र लांघने से पहले श्री जामवन्तजी उन्हें अपना बल याद दिलाते हुए जैसे ही कहते हैं कि “राम काज लगि तव अवतारा” यह सुनते ही प्रभु श्री हनुमानजी पर्वत के समान विशालकाय हो जाते हैं, यथा “सुनतहिं भयउ पर्बताकारा”। यहाँ पर प्रभु श्री हनुमानजी के स्वरूप का वर्णन आता है – “कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा॥” अर्थात उनका सोने का सा रंग है, शरीर पर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतों का राजा सुमेरु हो।
दूसरी बार जब वे अशोक वाटिका में सूक्ष्म रूप धारण करके भगवती सीता माता के सम्मुख गए तो एक बार तो माता को भी संदेह हुआ और वे बोलीं – “हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥ मोरें हृदय परम संदेहा।” अर्थात हे पुत्र! "हे पुत्र! सब वानर तो तुम्हारे ही समान छोटे होंगे और राक्षस तो बहुत बलवान हैं। इसलिए मेरे मन में बड़ा संदेह होता है कि तुम लोग राक्षसों को कैसे जीतोगे। “सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा” यह सुनते ही प्रभु श्री हनुमानजी अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट करते हैं और वो कैसा है – “कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥” अर्थात प्रभु श्री हनुमानजी का शरीर सोने के पर्वत (सुमेरु) के आकार का (अत्यंत विशाल) था, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करने वाला, अत्यंत बलवान और वीर था।
बिराज सुबेसाः प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु श्री रामजी की सेवा के लिए वानर देह धारण की थी, जिसमें सुंदर वेष तर्कसंगत नहीं लगता। तो फिर यहाँ ऐसा क्यों लिखा गया कि “बिराज सुबेसा” क्योंकि यहाँ बात तन के वेष की नहीं मन के वेष की हो रही है।
गोस्वामी श्री तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानसजी में लिखते हैं – “तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।” अर्थात सुंदर वेष देखकर न केवल मूर्ख अपितु बुद्धिमान मनुष्य भी धोखा खा जाते हैं।गोस्वामी श्री तुलसीदासजी आगे लिखते हैं – “लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥ उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥” अर्थात जो ठग हैं लेकिन सुंदर वेष धारण करते हैं, उन्हें भी अच्छा वेष बनाए देखकर वेष के प्रताप से जगत पूजता है, लेकिन एक-न-एक दिन उनकी असलियत सामने आ ही जाती है, अंत तक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हाल हुआ। कई बार वेष के प्रताप से पापी भी पूजे जाते हैं परंतु कपट उघरने पर अंत में निर्वाह नहीं होता क्योंकि केवल वेष ही सुवेष है लेकिन अंतःकरण शुद्ध नहीं है, मन में कपट भरा हुआ है।
तो फिर प्रभु श्री हनुमानजी का वेष कैसा है, गोस्वामी श्री तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानसजी में लिखते हैं – “किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥” अर्थात बुरा वेष बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है, जैसे जगत में श्री जामवन्तजी और प्रभु श्री हनुमानजी का हुआ। इससे दो बातें समझ में आती है कि एक तो प्रभु श्री हनुमानजी साधु हैं और दूसरा उनका शारीरिक वेष कुवेष है। तन से प्रभु श्री हनुमानजी वानर शरीर में हैं तो साधु कैसे तो वे तन से नहीं मन से साधु हैं। मन से साधु होने के कारण ही वे कुवेष धारण करते हैं ताकि जगत से छुपाव हो सकें। साधु संग से कुवेष का भी सम्मान है और असाधु के संग से सुवेष का भी अनादर है। साधु कुवेष धारण ही इसलिए करते हैं कि पूजे जाने से बच सकें और असाधु पूजे जाने के लिए ही सुवेष धारण करते हैं।
गोस्वामी श्री तुलसीदासजी दोहावली में लिखते हैं - “बचन बेष तें जो बनइ सो बिगरइ परिनाम । तुलसी मन तें जो बनइ बनी बनाई राम ॥” अर्थात दंभ से भरे हुए बाहरी वेष और वचनों से जो काम बनता है, वह दंभ खुलने पर अंत में बिगड़ जाता है। परंतु जो काम सरल मन से बनता है, वह तो प्रभु श्री रामजी की कृपा से बना-बनाया ही है। प्रभु तो स्वयं कहते हैं कि “निर्मल मन जन सो मोहि पावा” । तो प्रभु श्री हनुमानजी ने साधु का वेष नहीं बनाया बल्कि वे साधु हो गए, उन्होंने मन को निर्मल बनाया और यही उनका सुवेष है इसलिए श्री तुलसीदासजी लिखते है “बिराज सुबेसा”। प्रभु श्री हनुमानजी के इसी साधु वेष अर्थात सुवेष को समझाते हुए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी आगे लिखते हैं – “कानन कुंडल कुंचित केसा”।
कानन कुंडलः गोस्वामी श्री तुलसीदासजी प्रभु श्री हनुमानजी के वेष को समझाते हुए उसका वर्णन शुरू करते हैं और वर्णन कहाँ से शुरू करते हैं, कानों से कि प्रभु श्री हनुमानजी कानों में कुंडल धारण करते हैं। वेष का वर्णन श्रवणों के आभूषण से प्रारंभ किया और श्रवणों का आभूषण सांसारिक दृष्टि से तो कुंडल हैं लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से श्रवणों का आभूषण हैं “प्रभु की कथा” और प्रभु श्री हनुमानजी कौन हैं वे तो “राम चरित सुनिबे को रसिया” हैं। उनके कानों को तो एक ही चीज सुहाती हैं वो है प्रभु श्री रामजी की कथा और ये कथा ही उनके कानों के कुंडल हैं, यथा - “यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं, तत्र तत्र कृतमस्तकांजलिम्। वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम् ॥” अर्थात जहाँ-जहाँ प्रभु श्री रामजी की महिमा का गान होता है, वहाँ-वहाँ प्रभु श्री हनुमानजी हाथ जोड़े खड़े रहते हैं। उनकी आँखें प्रेमाश्रुओं से भरी होती हैं। तो गोस्वामी श्री तुलसीदासजी प्रभु श्री हनुमानजी के उस सुवेष को प्रणाम करते हैं जिसमें उन्होंने प्रभु श्री रामजी की कथा को अपने कानों का आभूषण बना रखा हैं।
कुंचित केसाः कानों के बाद गोस्वामी श्री तुलसीदासजी प्रभु श्री हनुमानजी के केस अर्थात बालों का वर्णन करते हैं। तन की दृष्टि से प्रभु श्री हनुमानजी के केस कुंचित अर्थात घुंघराले हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो बाल विचारों के प्रतीक हैं, बाल और विचार दोनों का ही जन्म सिर से ही होता है। बाल सीधे होते हैं और व्यक्ति का विचार भी सीधे जाने का (मोक्ष प्राप्ति का) ही होता हैं। लेकिन प्रभु श्री हनुमानजी के केस घुंघराले हैं अर्थात उनका विचार सीधे जाने का नहीं बल्कि लौटकर आने का है वे मोक्ष नहीं चाहते भगवत् धाम भी नहीं जाना चाहते वे तो यहीं रहकर बारंबार प्रभु श्री रामजी की कथा सुनना चाहते हैं।
प्रभु श्री रामजी जब श्रीलीला संवर्धन करके अपने धाम श्री साकेत धाम को जाने लगे तो उन्होंने प्रभु श्री हनुमानजी से कहा आप भी सबके साथ हमारे धाम चलिए। प्रभु श्री हनुमानजी ने कहा कि प्रभु मैं तो चलने को तैयार हूँ लेकिन वहाँ आपकी कथा तो होती है ना? प्रभु ने कहा नहीं वहाँ कथा की क्या जरूरत है वहाँ तो हम स्वयं ही होते हैं। तो प्रभु श्री हनुमानजी ने कहा कि प्रभु आप चलिए हम यहाँ आपकी कथा सुनकर आएंगे। प्रभु ने कहा कि आप कब तक यहाँ रहेंगे तो प्रभु श्री हनुमानजी ने कहा कि जब तक आपकी कथा यहाँ रहेगी मैं भी यहीं रहूंगा। प्रभु श्री हनुमानजी का मन यहाँ से जाने का करता ही नहीं, वे तो बार-बार यहीं लौटकर प्रभु की कथा का श्रवण करते रहना चाहते हैं और यही “कानन कुंडल कुंचित केसा” का आध्यात्मिक अर्थ है। तो इस चौपाई का शाब्दिक अर्थ चाहे देह की दृष्टि से उनके सुंदर स्वरूप का, उनके श्रृंगार का दर्शन कराना हो लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से उनके बारंबार कथा श्रवण को समझने का, ग्रहण करने का प्रयास जरूर करना चाहिए।