काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥५॥
शब्दार्थः बज्र = वज्र, अत्यंत कठोर। औ = और। ध्वजा = झंडा, पताका। मूँज = एक प्रकार की जंगली घास। जनेऊ = यज्ञोपवीत।
अर्थः आपके हाथ में वज्र (गदा) तथा ध्वजा है तथा कंधे पर मूँज का जनेऊ शोभायमान है।
गूढ़ अर्थः पिछली चौपाई में गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने प्रभु श्री हनुमानजी के मूल स्वरूप को समझाना प्रारंभ किया था, जिसके अंतर्गत हमने कानों के कुंडल एवं कुंचित केसों का आध्यात्मिक अर्थ समझा था । इस चौपाई में गोस्वामी श्री तुलसीदासजी प्रभु श्री हनुमानजी के मूल स्वरूप के वर्णन को आगे बढ़ाते हुए बताते हैं कि आपके एक हाथ में गदा है एवं दूसरे हाथ में ध्वजा है।
गोस्वामी श्री तुलसीदासजी प्रभु श्री हनुमानजी की आरती में लिखते हैं – “बाएं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे।” अर्थात प्रभु श्री हनुमानजी अपने बाएँ हाथ से दुष्टों का नाश करते हैं और दाएँ हाथ से संतों और भक्तों की रक्षा करके उन्हें संकटों से पार लगाते हैं। आगे हम श्री हनुमान चालीसाजी में भी देखेंगे कि – “साधु संत के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥” अर्थात हे श्री रामजी के दुलारे! आप सज्जनों की रक्षा करते हैं और दुष्टों का नाश करते हैं। इन दोनों ही उदाहरणों से एक बात तो स्पष्ट है कि आप दुष्टों का नाश करते हैं, इसलिए एक हाथ में गदा धारण करते हैं तथा सज्जनों की रक्षा भी करते हैं एवं श्री रामजी के दुलारे भी हैं इसलिए दूसरे हाथ में ध्वजा धारण करते हैं।
हाथ बज्रः प्रभु श्री हनुमानजी एक हाथ में बज्र अर्थात गदा धारण करते हैं और उनकी ये अत्यंत कठोर गदा कालस्वरूप है, क्योंकि इससे ही वे दुष्टों का संहार करते हैं। काल समय को भी कहते हैं, वैसे तो हम सभी काल के हाथ में हैं लेकिन वो काल भी प्रभु श्री हनुमानजी के हाथ में है और क्यों है क्योंकि उन पर श्रीरघुबर की कृपा है, यथा – “उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥” श्रीरघुबर का प्रताप तो ऐसा है कि – “जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥” अर्थात देवता, राक्षस और समस्त चराचर को खा जाने वाला वह काल भी श्रीरघुबर के डर से अत्यंत डरता है। श्रीरघुबर तो भौंह के इशारे मात्र से काल को भी खा जाने का सामर्थ्य रखते हैं तो उनकी कृपा जिन पर हो, काल को उनके हाथ में आना ही पड़ता है। इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी दुष्टों के संहार हेतु एक हाथ में कालदंडस्वरूप गदा धारण करते हैं।
हाथ बज्र का एक भाव यह भी निकलता है कि प्रभु श्री हनुमानजी का हाथ वज्र के समान है। चौपाई २ “रामदूत अतुलित बल धामा” में हमने रावण और प्रभु श्री हनुमानजी के बीच एक-एक घूँसे वाला प्रसंग देखा था। प्रभु श्री हनुमानजी के एक ही प्रहार से रावण कैसे गिरा था, वर्णन आता है – “मुठिका एक ताहि कपि मारा। परेउ सैल जनु वज्र प्रहारा॥” अर्थात वह इस तरह गिरा जैसे वज्र की मार से कोई पर्वत टूटकर गिरा हो।
औ ध्वजा बिराजैः प्रभु श्री हनुमानजी दूसरे हाथ में ध्वजा लहराते हैं और अगर प्रभु श्री हनुमानजी ध्वजा लहराएंगे तो स्वाभाविक है कि वह तो श्रीरघुबर के यश की ही ध्वजा होगी, यथा “रघुपति कीरति बिमल पताका” अर्थात श्री रघुनाथजी की कीर्ति रूपी विमल पताका सदा आपके हाथ में रहती है। पिछली चौपाई में हमने देखा था कि श्रीरघुबर की कथा का बारंबार श्रवण ही आपके कानों का आभूषण है, तो पहले तो आप श्रीरघुबर के यश का कानों से श्रवण करते हैं और फिर हाथों से वही यश ध्वजारूप में लहराते हैं अर्थात सबमें बांट देते हैं। इस पंक्ति से एक बात और स्पष्ट हो जाती है कि श्रीरघुबर के यश की ध्वजा वही लहरा सकता है जिसने काल को भी अपने वश में कर रखा हो अर्थात जो कलिकाल की माया से प्रभावित न हो।
यहाँ एक शंका मन में आ सकती है कि जब एक हाथ में श्रीरघुबर की कीर्ति रूपी पताका है तो फिर दूसरे हाथ में गदा क्यों? इसका उत्तर श्रीरामचरितमानसजी के लंकाकाण्ड के एक प्रसंग में मिलता है जब रावण प्रभु से लड़ने के लिए रथ पर सवार होकर आता है और प्रभु बिना रथ के होते हैं। तब श्री विभीषणजी को संदेह होता है कि अब यह युद्ध कैसे जीता जाएगा। तब प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि हे विभीषण! जिस रथ से जय प्राप्त होती है वह रथ दूसरा ही है। गूढ़ अभिप्राय यह है कि जो भौतिक रथ रावण के पास है उससे जय प्राप्त नहीं होती बल्कि जय देने वाला तो आध्यात्मिक रथ है जो हमारे भीतर है, उस धर्ममय रथ से ही विजय प्राप्त होगी।
प्रभु आगे कहते है - “सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥” अर्थात शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं एवं सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। युद्ध के रथ में चार पहिए नहीं होते दो ही होते है, आगे अश्व होता है। शौर्य और धैर्य धर्मरथ के दो पहिए हैं। निर्भयता के साथ धर्मयुद्ध में प्रवेश करने का सामर्थ्य ही शौर्य है और सुख या दुःख प्राप्त होने पर भी मन में कोई विकार न आना ही धैर्य है। दोनों के बिना काम नहीं चलेगा। केवल शौर्य हो और धैर्य न हो, या फिर केवल धैर्य हो और शौर्य न हो, दोनों ही परिस्थिति में धर्मरथ आगे नहीं बढ़ पाएगा। इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी धर्मरक्षा हेतु एक हाथ में गदा धारण करते हैं।
सत्य और शील इस रथ की ध्वजा और पताका है। सत्य सभी धर्मों का मूल है, यथा “धर्म न दूसर सत्य समाना”। सत्य सभी धर्मों में श्रेष्ठ है। सत्यरूपी ध्वजा से ही धर्मरथ लक्षित होता है और शीलरूपी विजय पताका फहराती है। दीन हीन मलीन कैसा भी पापी या अपराधी सामने आए, उसके दोष न देखना, उसका हित करना ही ‘शील’ है। जैसे युद्ध में रथ की ध्वजा-पताका कटकर गिरना पराजय का प्रतीक है वैसे ही जीवन में सत्य-शीलहीन व्यक्ति भवरूपी शत्रु से पराजित माना जाता है। प्रभु श्री हनुमानजी में शौर्य भी है, धैर्य भी है इसलिए वे एक हाथ में गदा धारण करते है, और उनमें सत्य भी है और शील भी है, इसलिए वे दूसरे हाथ में ध्वजा धारण करते हैं, वे ही श्रीरघुबर के धर्मरथ हैं और यही इस पंक्ति का आध्यात्मिक अर्थ है।
काँधे मूँज जनेऊ साजैः प्रभु श्री हनुमानजी अपने कंधे पर मूँज का जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण करते हैं। यह उनके बाल-ब्रह्मचारी होने का द्योतक है। मूँज एक प्रकार की तेज धार वाली जंगली घास होती है, जिसके रेशे को बटकर विधिपूर्वक मूँज का मोटा जनेऊ बनाया जाता था। पुराने समय में ऋषि-मुनि, साधु-संत, सन्यासी आदि मूँज का मोटा चुभने वाला जनेऊ ही धारण करते थे। ऐसा करने से साधन में आने वाली व्याधियों जैसे निद्रा, आलस्य आदि से रक्षा होती थी।
हमारी संस्कृति में जनेऊ यानी यज्ञोपवीत का बहुत बड़ा महत्व है। जनेऊ हिन्दू धर्म में एक पवित्र धागा होता है, जिसे विशेष रूप से सोलह संस्कारों में से एक उपनयन संस्कार के बाद धारण किया जाता है। उपनयन संस्कार के बाद उसे धर्म, शिक्षा और आचरण के नियमों का पालन करना होता है। जनेऊ के तीन धागे हमेशा याद दिलाते हैं कि व्यक्ति पर तीन कर्तव्य हैं: देवताओं के प्रति, ऋषियों के प्रति एवं पूर्वजों के प्रति। जनेऊ पहनने का मतलब होता है कि अब व्यक्ति आध्यात्मिक और नैतिक जीवन की ओर बढ़ रहा है।
जब प्रभु श्री रामजी भगवती सीता माता के स्वयंवर में प्रभु श्री महादेवजी का धनुष तोड़ देते हैं, तब क्रोधित होकर प्रभु श्री परशुरामजी वहाँ आते हैं। श्री लक्ष्मणजी के साथ तीखी बातचीत में वे अत्यंत क्रोधित हो जाते हैं। तब श्री लक्ष्मणजी कहते हैं – “भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी॥” अर्थात भृगुवंशी समझकर और आपका यज्ञोपवीत देखकर तो जो कुछ आप कहते हैं, उसे मैं क्रोध को रोककर सह लेता हूँ।
जब मनुष्य जन्म लेता है तो वह विगत जन्मों के अनेक अच्छे-बुरे संस्कारों से प्रभावित रहता है। लेकिन यज्ञोपवीत संस्कार द्वारा उसमें अच्छे संस्कारों का बीजारोपण होता है। इस प्रकार मनुष्य किसी भी जाति से संबंध हो वह द्विज कहलाता है। द्विज का तात्पर्य होता है ‘द्वि’ यानी द्वितीय एवं ‘ज’ यानि जन्म अर्थात यज्ञोपवीत संस्कार के बाद उसका दूसरा जन्म होना माना जाता है—पहला जन्म शरीर से, और दूसरा ज्ञान और संस्कार से। जनेऊ मुख्य रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के पुरुषों द्वारा पहना जाता है। मनुस्मृति के अनुसार ब्राह्मण के लिए 8वें, क्षत्रिय के लिए 11वें और वैश्य के लिए 12वें वर्ष में उपनयन का विधान है।
आध्यात्मिक रूप से भगवान हमारे भीतर हैं इस भाव को समझने के लिए ही जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण किया जाता है। प्रभु श्री हनुमानजी तो “राम लखन सीता मन बसिया” हैं ही सो प्रभु उनके हृदय में निरंतर वास करते हैं इसके प्रमाण के रूप में उनके कंधे पर मूँज का जनेऊ सदा शोभायमान रहता है। इस चौपाई में गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने प्रभु श्री हनुमानजी के बाहरी मूल स्वरूप को तो बताया ही है जिसके अंतर्गत प्रभु श्री हनुमानजी एक हाथ में वज्र तथा एक हाथ में ध्वजा धारण करते हैं एवं कंधे पर मूँज का जनेऊ धारण करते है लेकिन साथ-ही-साथ इस चौपाई का चिंतन करते समय हमें बाहरी सौंदर्य के साथ-साथ आंतरिक सौंदर्य को भी समझना चाहिए कि प्रभु श्री हनुमानजी ने शौर्य, धैर्य, सत्य और शील धारण करते हुए स्वयं के हृदय को निर्मल बना रखा है, जिससे ही उनके हृदय में प्रभु श्री रामजी बसते हैं।
चौपाई ४ः कंचन बरन बिराज सुबेसा
अगली चौपाईः Will be Posted on Sunday, May 17, 2026