चौपाई ११ः लाय सजीवन लखन जियाये - श्री हनुमान चालीसा चौपाई, अर्थ, भावार्थ और विस्तार

चौपाई ११ः लाय सजीवन लखन जियाये

लाय सजीवन लखन जियाये ।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥

शब्दार्थः सजीवन = संजीवनी बूटी। जियाये = जीवित किया। हरषि = प्रसन्न होकर। उर लाये = हृदय से लगा लिया।

अर्थः आपने संजीवनी बूटी लाकर श्री लक्ष्मणजी को जिलाया जिससे हर्षित होकर प्रभु श्रीरघुबीरजी ने आपको हृदय से लगा लिया।

गूढ़ अर्थः पिछली दो चौपाइयों में गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने प्रभु श्री हनुमानजी के विभिन्न रूपों का वर्णन किया। अभी तक गोस्वामीजी प्रभु श्री हनुमानजी के मूल स्वरूप, उनके बाह्य स्वरूप, आंतरिक स्वरूप, उनके स्वभाव तथा उनके विभिन्न रूपों का वर्णन कर चुके हैं। इस चौपाई से वे प्रभु श्री हनुमानजी के प्रमुख कार्यों का वर्णन प्रारंभ कर रहे हैं। इस चौपाई में गोस्वामी श्री तुलसीदासजी प्रभु श्री हनुमानजी द्वारा संजीवनी बूटी लाकर श्री लक्ष्मणजी को जीवित करने के प्रसंग का उल्लेख करते हैं।

श्रीरामचरितमानसजी के लंकाकाण्ड में वर्णित युद्ध के प्रसंग के अनुसार प्रभु श्री हनुमानजी, श्री अंगदजी आदि वानर वीरों ने लंका को चारों तरफ से घेरकर आक्रमण कर दिया। मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ पुनि छेंका आइ। उतर्‌यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ॥ अर्थात मेघनाद को जैसे ही इस घटना का पता चला कि वानरों ने आकर किले को घेर लिया है वह क्रोधित होकर युद्ध मैदान में उतर आया।

युद्ध मैदान में आते ही मेघनाद ने पहले तो सभी वानर वीरों को ललकारा। दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर। सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर॥ फिर उसने सबको दस-दस बाण मारे, वानर वीर पृथ्वी पर गिर पड़े। मेघनाद सिंह के समान नाद करके गरजने लगा। जैसे ही प्रभु श्री हनुमानजी ने सेना को बेहाल देखा वे काल की भाँति दौड़े और एक बड़ा भारी पहाड़ उखाड़कर उसे मेघनाद पर फेंका, जिसे देख वह तो माया से आकाश में उड़ गया लेकिन उसका रथ, सारथी, घोड़े सब नष्ट हो गए।

बार बार पचार हनुमाना। निकट न आव मरमु सो जाना॥

प्रभु श्री हनुमानजी उसे बार-बार ललकारते हैं लेकिन वह उनके सामने ही नहीं आता, क्योंकि वह उनके अतुलनीय बल का मर्म जानता था। पहले भी उसका दो बार प्रभु श्री हनुमानजी से सामना हो चुका था और वह उनके बल से भलीभाँति परिचित था। मेघनाद वहाँ से प्रभु श्री रघुनाथजी के समीप गया और उन्हें दुर्वचन कहने लगा।

श्री लक्ष्मणजी से यह देखा न गया। आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ। लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ॥ उन्होंने प्रभु श्री रामजी से आज्ञा माँगी एवं अंगद आदि वानरों के साथ हाथों में धनुष-बाण लिए क्रुद्ध होकर चले। मेघनाद और श्री लक्ष्मणजी में भयंकर युद्ध हुआ। नाना बिधि प्रहार कर सेषा। राच्छस भयउ प्रान अवसेषा॥ रावन सुत निज मन अनुमाना। संकठ भयउ हरिहि मम प्राना॥ श्री लक्ष्मणजी उस पर अनेक प्रकार से प्रहार करने लगे। रावणपुत्र मेघनाद के प्राण सूख गए, उसने मन में अनुमान किया कि अब तो प्राणों पर संकट आ बना, ये मेरे प्राण हर लेंगे।

बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेजपुंज लछिमन उर लागी॥
मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥

तब मेघनाद ने वीरघातिनी शक्ति चलाई। वह तेजपूर्ण शक्ति श्री लक्ष्मणजी की छाती में लगी जिससे उन्हें मूर्च्छा आ गई। तब मेघनाद भय छोड़कर उनके पास चला गया। मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ। जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ॥ मेघनाद और उसके समान अनेकों योद्धाओं ने श्री लक्ष्मणजी को उठाकर ले जाने का प्रयास किया परंतु जगत के आधार श्री शेषजी (श्री लक्ष्मणजी) को वे हिला भी न सके और लज्जित होकर चले गए।

इस श्रीलीला को समझना आसान नहीं है। प्रभु श्री महादेवजी भगवती पार्वती माता से कहते हैं कि -

सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू॥
सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही॥
यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई॥

हे गिरिजे! सुनो, प्रलयकाल में जिन शेषनाग के क्रोध की अग्नि चौदहों भुवनों को तुरंत ही जला डालती है और देवता, मनुष्य तथा समस्त चराचर जीव जिनकी सेवा करते हैं, उनको संग्राम में भला कौन जीत सकता है? इस लीला को वही जान सकता है, जिस पर प्रभु श्री रामजी की कृपा हो।

प्रभु श्री हनुमानजी श्री लक्ष्मणजी को उठाकर वापस ले आए। प्रभु श्री रामजी उन्हें मूर्छित देखकर अत्यंत दुःखी हुए। श्री जामवंतजी ने कहा कि लंका में सुषेण वैद्य रहता है, उसे लाने के लिए किसको भेजा जाए? जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना॥ धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता॥ तब प्रभु श्री हनुमानजी लघु रूप धरकर गए और सुषेण को उसके घर समेत तुरंत ही उठा लाए।

सुषेण ने आकर श्री लक्ष्मणजी को देखा और “कहा नाम गिरि औषधि” औषधि एवं पर्वत का नाम बताया। उन्होंने कई औषधियों के नाम बताए – यथा, विशल्यकरणी (घाव भरने वाली), सावर्ण्यकरणी (पूर्ववत शरीर कर देने वाली), संजीवकरणी (जीवित करने वाली) एवं संधानी (टूटे अंगों को जोड़ने वाली) साथ ही कहा कि द्रोणाचल पर्वत के उत्तर दिशा में मिलने वाली संजीवनी बूटी को अगर आज रात-रात में ही सूर्योदय के पूर्व लाया जा सके तो इन्हें जीवित किया जा सकता है।

एक बड़ा गूढ़ संकेत यहाँ मिलता है, संजीवनी बूटी क्या है – “रघुपति भगति सजीवन मूरी” श्री रघुनाथजी की भक्ति ही संजीवनी है, कहाँ मिलेगी – “पावन पर्वत बेद पुराना” वेद-पुराण ही पर्वत है, किस दिशा में मिलेगी उत्तर में अर्थात वेदों के उत्तरकाण्ड में ही भक्ति की संजीवनी मिलेगी। और रात बीतने के पहले आ जाए अर्थात जीवन बीतने के पहले जो श्री रघुनाथजी की संजीवनी रूपी भक्ति को पा लेता है वह समस्त विकारों से मुक्त होकर प्रभु को पा लेता है।

द्रोणाचल पर्वत लंका से 60 लाख योजन दूर था। इतने कम समय में इतनी दूर से बूटी लाना लगभग असंभव था। लेकिन प्रभु श्री हनुमानजी को बल याद दिलाते समय श्री जामवंतजी ने कहा था कि – “कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥” प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु श्रीरामजी के चरणकमलों को हृदय में रखकर एवं अपना बल बखानकर चले, यथा – “राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजनसुत बल भाषी॥” जाते समय प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु का दुख दूर करने के लिए समुद्र लंघन से भी ज्यादा उत्साह दिखाया एवं अपने बल का बखान किया एवं उड़ चले। रास्ते में कालनेमि नामक राक्षस ने बाधा उत्पन्न करने का प्रयास किया परंतु सफल न हो पाया। उसे मारकर प्रभु श्री हनुमानजी तुरंत द्रोणाचल पर्वत पर पहुँचे।

देखा सैल न औषध चीन्हा। सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा॥
गहि गिरि निसि नभ धावक भयऊ। अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ॥

प्रभु श्री हनुमानजी ने पर्वत को देखा, पर औषधि न पहचान सके। श्री अध्यात्म रामायण के अनुसार सभी औषधियाँ अग्निवत थीं, उन्हें प्रकाशित देख प्रभु श्री हनुमानजी कूद-कूद कर उन्हें देखने लगे, जिससे वे अदृश्य हो गई। तब प्रभु श्री हनुमानजी ने एकदम से पूरे पर्वत को ही उखाड़ लिया। प्रभु श्री हनुमानजी ने पूरा पर्वत ही क्यों उठा लिया इसका एक संत के मुख से अत्यंत ही भावपूर्ण वर्णन सुना है। जब प्रभु श्री हनुमानजी संजीवनी बूटी लेकर आने लगे तो वहाँ उपस्थित अन्य दिव्य औषधियों ने उनसे विनती की कि वे भी प्रभु श्री रामजी के दर्शन करना चाहती हैं। औषधियों की इस निष्काम भक्ति और प्रार्थना से प्रसन्न होकर प्रभु श्री हनुमानजी ने पूरा पर्वत ही साथ ले लिया। श्री गीतावली में वर्णन आता है कि सभी औषधियाँ दिव्य एवं चमकदार थीं इससे पहचान नहीं सके, यथा –

कालनेमि दलि बेगि बिलोक्यौ द्रोनाचल जिय जानि ।
देखी दिब्य ओषधी जहँ तहँ जरी, न परि पहिचानि ॥
लियो उठाय कुधर कन्दुक-ज्यौं, बेग न जाइ बखानि ।
ज्यों धाए गजराज-उधारन सपदि सुदरसनपानि ॥

प्रभु श्री हनुमानजी ने उस पूरे पहाड़ को कन्दुक (गेंद) की तरह उठा लिया। उनकी गति इतनी तीव्र थी कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। पर्वत उखाड़कर वे इतनी तेजी से भागे जैसे श्रीगजेन्द्रजी की रक्षा करने के लिए स्वयं चक्रधारी भगवान श्री विष्णुजी चक्रराज सुदर्शन चक्र के साथ दौड़े हों। पर्वत लेकर प्रभु श्री हनुमानजी रात में ही आकाश मार्ग से दौड़ चले और श्री अयोध्यापुरी के ऊपर पहुँच गए।

देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।
बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि॥

श्री भरतजी ने आकाश में अत्यंत विशाल स्वरूप हाथ में पर्वत लिए देखा, तब मन में अनुमान किया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कान तक धनुष को खींचकर बिना फल का एक बाण मारा। श्री भरतजी ने ऐसा बाण मारा कि केवल प्रभु श्री हनुमानजी गिरे, वह पर्वत उसी बाण पर टिका रहा और श्री अयोध्याजी पर नहीं गिरा। श्री गीतावलीजी में वर्णन आता है कि श्री पवनदेव ने उस पर्वत को थाम लिया। प्रभु श्री हनुमानजी "हे राम हे रघुनायक" कहते हुए श्री अयोध्याजी की धरती पर मूर्छित होकर गिरे।

यह संपूर्ण प्रसंग बहुत ही सांकेतिक है। एक ही दिन में दो मुर्छाएँ हुईं। श्री लक्ष्मणजी कामरूपी मेघनाद के बाण से मूर्छित हुए और लंका की भूमि पर गिरे। प्रभु श्री हनुमानजी भगवत प्रेमी श्री भरतजी के बाण से मूर्छित हुए और श्री अयोध्याजी की भूमि पर गिरे। अर्थात साधक को जब जीवन में विकाररूपी बाण लगता है तो वह वासना की भूमि (लंका) पर गिरता है और साधक को जब भगवत प्रेम रूपी बाण लगता है तो वह उपासना की भूमि (श्री अयोध्याजी) पर गिरता है।

गिरते समय प्रभु श्री हनुमानजी द्वारा प्रभु श्री रामजी की पुकार सुन श्री भरतजी ने पहचान लिया कि यह कोई श्रीरामभक्त है। श्री भरतजी ने मूर्छित प्रभु श्री हनुमानजी को हृदय से लगा लिया और दुःखी मन से बोले कि “जौं मोरें मन बच अरु काया। प्रीति राम पद कमल अमाया॥ तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला॥” अर्थात यदि मन, वचन और शरीर से प्रभु श्रीरामजी के श्रीचरणकमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो, और यदि श्रीरघुनाथजी मुझ पर प्रसन्न हों तो यह वानर थकावट और पीड़ा से रहित हो जाए। यह वचन सुनते ही प्रभु श्री हनुमानजी 'कोसलपति श्री रामचंद्रजी की जय हो, जय हो' कहते हुए उठ बैठे। प्रभु श्री हनुमानजी ने सब कथा उन्हें संक्षेप में सुनाई। श्री भरतजी ने कहा कि आप मेरे बाण पर पर्वत समेत चढ़ जाओ, मैं आपको तुरंत वहाँ पहुँचा देता हूँ जहाँ प्रभु श्री रामजी हैं।

इधर आधी रात बीत जाने पर भी प्रभु श्री हनुमानजी नहीं आए तो श्री लक्ष्मणजी को देख-देख कर प्रभु श्री रामजी विकल हो गए। प्रभु को विकल एवं दुःखी देखकर पूरा वानर समूह दुःखी हो गया। उसी समय प्रभु श्री हनुमानजी इतनी तेजी से वहाँ पहुँचे जैसे करुणा में वीर रस आ गया हो, यथा - प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर। आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस॥ प्रभु श्री हनुमानजी जैसे ही संजीवनी लेकर आए तो गोस्वामी श्री तुलसीदासजी कहते हैं कि – “लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥”

हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना॥

प्रभु श्री रामजी अत्यंत हर्षित होकर प्रभु श्री हनुमानजी से गले मिले क्योंकि प्रभु परम सुजान और अत्यंत ही दयालु हैं। प्रभु श्री रामजी इतने कृतज्ञ हैं कि अभी तो प्रभु श्री हनुमानजी आए हैं, न तो औषधि दी है और न ही श्री लक्ष्मणजी सचेत हुए हैं, लेकिन प्रभु श्री हनुमानजी ने जो कहा वो कर दिखाया इसलिए प्रभु कृतज्ञ होकर उन्हें हृदय से लगा लेते हैं। प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री हनुमानजी में अत्यंत भावुक संवाद यहाँ पर होता है जिसे हम आने वाली दो चौपाइयों में विस्तार से देखेंगे।

चौपाई १०ः भीम रूप धरि असुर सँहारे अगली चौपाईः रविवार, 09 अगस्त 2026 को प्रकाशित की जाएगी।