भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचंद्र के काज सँवारे ॥१०॥
शब्दार्थः भीम = भयंकर, विकराल, भयावह। धरि = धारण करके। सँहारे = मारे, नष्ट कर दिए। काज = कार्य। सँवारे = कुशलतापूर्वक किए।
अर्थः आपने विकराल रूप धारण करके राक्षसों को मारा और प्रभु श्री रामचंद्रजी के समस्त कार्यों को सफल बनाने में सहयोग दिया।
गूढ़ अर्थः पिछली चौपाई में गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने प्रभु श्री हनुमानजी के विभिन्न रूपों का वर्णन प्रारंभ किया था। जिसके अंतर्गत हमने देखा कि आपने सूक्ष्म रूप धारण करके भगवती सीता माता को दिखाया एवं विकट रूप धारण करके लंका को जलाया। इस चौपाई में गोस्वामी श्री तुलसीदासजी बताते हैं कि प्रभु श्री हनुमानजी भीम रूप धारण करके असुरों का संहार करते हैं और इस प्रकार वे विभिन्न रूप धारण करके भी एक ही मुख्य कार्य करते हैं और वो है प्रभु श्री रामजी का कार्य।
असुरों का संहार करने के लिए प्रभु श्री हनुमानजी ने भीमरूप ही क्यों धारण किया, इसे समझने के लिए पहले हमें असुरों को समझना होगा। श्रीरामचरितमानसजी के बालकाण्ड में रावण की सेना में असुर कैसे थे इसका वर्णन आता है – “देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर देव परितापी॥ करहिं उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया॥” अर्थात सब राक्षसों के समूह देखने में बड़े भयानक, पापी और देवताओं को दुःख देने वाले थे। वे उपद्रव करते थे और माया से अनेकों प्रकार के रूप धरते थे, यथा – “कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया॥” अर्थात ये सभी राक्षस मनमाना रूप बना सकते थे और आसुरी माया जानते थे। उनके अंदर दया-धर्म स्वप्न में भी नहीं था।
श्रीरामचरितमानसजी के सुंदरकाण्ड में भी जब प्रभु श्री हनुमानजी लंका पहुँचते हैं और एक पर्वत पर चढ़कर लंकापुरी को देखते हैं, तब रावण की सेना का वर्णन आता है – “बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥” अर्थात अनेक रूपों के राक्षसों के समूह हैं, उनकी अत्यंत बलवती सेना वर्णन करते नहीं बनती। कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं। नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥ अर्थात कहीं पर्वत के समान विशाल शरीर वाले बड़े ही बलवान असुर गरज रहे हैं। वे अनेकों अखाड़ों में बहुत प्रकार से भिड़ते और एक-दूसरे को ललकारते हैं। करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं॥ अर्थात भयंकर शरीर वाले करोड़ों योद्धा यत्न करके अत्यंत सावधानी से लंका की चारों दिशाओं से रखवाली करते हैं।
यहाँ राक्षसों का वर्णन मात्र उसी कारण से किया गया है जिस कारण से गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने किया था, यथा – “एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥” अर्थात इनकी कथा इसीलिए कुछ थोड़ी-सी कही है कि ये निश्चय ही प्रभु श्री रामजी के बाणरूपी तीर्थ में शरीरों को त्यागकर परमगति पावेंगे। और प्रभु श्री हनुमानजी भी प्रभु श्री रामजी के बाण के समान ही हैं, यथा – “जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥”
अब जरा सोचिए कि ऐसे शक्तिशाली असुरों का संहार करना हो तो सूक्ष्म रूप धारण करके तो नहीं किया जाएगा, इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी भीमरूप धारण करके असुरों का संहार करते हैं। यहाँ ‘भीम’ शब्द से आशय श्री महाभारतजी के श्री भीमसेन से नहीं है बल्कि ‘भीम’ एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है भयंकर। प्रभु श्री हनुमानजी का भीमरूप अत्यंत विशाल, बलशाली एवं शत्रुओं के हृदय में भय पैदा करने वाला है।
जब प्रभु श्री हनुमानजी भगवती सीता माता के समक्ष सूक्ष्म रूप धारण करके गए थे तब माता को संदेह हुआ कि इतने छोटे वानर राक्षसों को कैसे जीतेंगे तब प्रभु श्री हनुमानजी ने माता को विश्वास दिलाने के लिए अपना भीम रूप उन्हें दिखाकर उनका संदेह दूर किया, यथा – “कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥” अर्थात सोने के पर्वत के आकार का अत्यंत विशाल शरीर, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करने वाला, अत्यंत बलवान और वीर था।
प्रभु श्री हनुमानजी ने भीम रूप धरकर असुरों का संहार कैसे किया इसका बहुत ही सुंदर वर्णन श्री सुंदरकाण्डजी में आता है। भगवती सीता माता से आज्ञा लेकर प्रभु श्री हनुमानजी अशोक वाटिका के उपवन में पहुँचे और वहाँ फल खाकर वृक्षों को तोड़ने लगे ताकि असुरों का ध्यान इस तरफ जाए। इस प्रसंग में गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने पाँच प्रकार के असुरों का वर्णन किया है, जिनका प्रभु श्री हनुमानजी ने संहार किया।
भटः वहाँ बहुत से असुर योद्धा रखवाली करते थे। रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥ उनमें से प्रभु श्री हनुमानजी ने कुछ को मार डाला और कुछ ने जाकर रावण से पुकार की। श्रीमद्वाल्मिकी रामायण के अनुसार अशोक वाटिका में केवल राक्षसियाँ थी, उन्होंने रावण को विध्वंस की खबर दी थी तब रावण ने अस्सी हजार ‘किंकर’ नामक असुर भेजे थे। प्रभु श्री हनुमानजी ने सबको मार डाला था और कुछ ने जाकर रावण को बताया कि हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है। उसने अशोक वाटिका उजाड़ डाली, फल खाए, वृक्षों को उखाड़ डाला और रखवालों को भी मसल-मसलकर जमीन पर डाल दिया।
नाना भटः राक्षसों ने जाकर बताया था कि एक बड़ा “भारी कपि” आया हैं इसलिए रावण ने अब साधारण नहीं बल्कि “नाना भट” भेजे। नाना अर्थात बहुत सारे और अनेक प्रकार की युद्धकला में कुशल। सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥ सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥ उन्हें देखकर प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु श्री रामचंद्रजी के नाम की गर्जना की, जिसे सुनकर कितने ही असुर भय से त्रस्त हो गए। प्रथम युद्ध में साधारण भट थे तो उन्हें बिना गर्जना के ही मर्दन करके मार डाला था, परन्तु इस बार गर्जना की। सब असुरों को प्रभु श्री हनुमानजी ने मार डाला, कुछ जो अधमरे थे, चिल्लाते हुए रावण के पास गए।
सुभटः फिर रावण ने अक्षयकुमार को भेजा। वह अपने साथ असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओं को साथ लेकर चला। पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥ आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥ उसे आते देखकर प्रभु श्री हनुमानजी ने एक वृक्ष हाथ में लेकर ललकारा और उसे मारकर बड़े जोर से गर्जना की। कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि। कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥ उन्होंने सेना में से कुछ को मार डाला और कुछ को मसल डाला और कुछ को पकड़-पकड़कर धूल में मिला दिया। कुछ ने फिर जाकर रावण से पुकार की कि हे प्रभु! वानर तो बहुत ही बलवान है।
दारुन भट एवं महाभटः अक्षयकुमार के वध की बात का सुनकर रावण अत्यंत क्रोधित हो उठा और उसने अपने बलवान पुत्र मेघनाद को भेजा। चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥ कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥ प्रभु श्री हनुमानजी ने देखा कि अबकी बार भयानक योद्धा आया है। तब वे कटकटाकर गरजे और दौड़े। उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और उसके प्रहार से मेघनाद को बिरथ कर दिया अर्थात उसके रथ को तोड़कर उसे नीचे पटक दिया। रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दई निज अंगा॥ उसके साथ जो बड़े-बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर प्रभु श्री हनुमानजी अपने शरीर से मसलने लगे। उन सबको मारकर वे फिर मेघनाद से लड़ने लगे। फिर उसने बहुत माया रची, परंतु श्री पवनपुत्र उससे जीते नहीं गए।
इस प्रकार प्रभु श्री हनुमानजी ने भीमरूप धारण करके असुरों का संहार किया। इसलिए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी लिखते हैं “भीम रूप धरि असुर सँहारे”। प्रभु श्री हनुमानजी के असुर संहार की सराहना तो स्वयं प्रभु श्री रामजी अपने श्रीमुख से करते हैं और गोस्वामी श्री तुलसीदासजी अपने साहिब सुजान प्रभु श्री रामजी की रीति की सराहना करते हैं। श्री कवितावली के अनुसार -
हाथिन सों हाथी मारे घोरे सों सँघारे घोरे,
रथन सों रथ बिदरनि बलवानकी।
चंचल चपेट, चोट चरन चकोट चाहें,
हहरानि फौजें भहरानी जातुधानकी॥
बार बार सेवक सराहना करत राम,
‘तुलसी’ सराहै रीति साहेब सुजानकी।
लाँबी लूम लसत लपेटि पटकत भट,
देखौ देखौ लखन लरनि हनुमान की॥
इस पंक्ति से हमें भी यह सीख लेनी चाहिए कि हमारे भी जीवन में कई बार काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर रूपी असुर आक्रमण करते रहते हैं लेकिन उनसे विनम्र होकर नहीं लड़ा जा सकता। उनसे लड़ना तो उनसे भी अधिक शक्तिशाली बनकर अर्थात भीमरूप धारण करके ही उनका नाश किया जा सकता है। और स्वयं को शक्तिशाली बनाने के लिए भक्तिरूपी भगवती सीता माता की शरण लेना जरूरी है। जीवन में भक्ति होगी तो ये काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर रूपी असुर भय के मारे निकट भी नहीं आएंगे।
रामचंद्र के काज सँवारेः श्री हनुमान चालीसा जी की चौपाई ७ः बिद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर॥ के अंतर्गत हम देख चुके हैं कि प्रभु श्री हनुमानजी श्री रामकाज करने के लिए अत्यंत ही आतुर रहते हैं। प्रभु श्री रामजी ने अपना सेवक जानकर उन्हें अपनी मुद्रिका दी थी और कहा था कि “बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु॥” प्रभु श्री हनुमानजी ने भगवती सीता माता के दर्शन कर लिए, उन्हें मुद्रिका दे दी, प्रभु का संदेश सुना दिया तब जाकर उन्हें भूख की सुध आई अन्यथा “राम काज कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम”।
लेकिन अभी कुछ कार्य और बाकी थे। भगवती सीता माता से अतिशय भूख की बात कहकर आज्ञा ली। ये अतिशय भूख किस बात की थी, अभी प्रभु श्री हनुमानजी के हृदय में रिपुसैन्यमर्दन, रावणमानभंजन एवं शत्रुबल आकलन का भाव भी था, क्योंकि प्रभु ने जितना कार्य बताया था वो तो पूर्ण हो गया था सो अब भगवती सीता माता से आज्ञा मांगी और माता ने “देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु। रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥” प्रभु श्री हनुमानजी को बुद्धि और बल में निपुण देखकर कहा कि हे तात! जाओ और प्रभु श्री रघुनाथ जी के चरणों को हृदय में धारण करके मीठे फल खाओ अर्थात कार्य संपन्न करो।
श्री सुग्रीवजी ने प्रस्थान पूर्व प्रभु श्री हनुमानजी सहित वानर दल से कहा था कि “मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु॥” अर्थात मन, कर्म और वचन से वह उपाय खोजना और करना जिससे प्रभु श्री रामचन्द्रजी का कार्य सफल हो। ‘मन’ का कार्य हैं यत्न विचारना, कार्य को सँवारना ‘कर्म’ है और भगवती सीता माता को समझाना ही ‘वचन’ है। प्रभु श्री हनुमानजी ने मन, वचन और कर्म से, अलग-अलग उपाय करके, भिन्न-भिन्न रूप धारण करके सकल कार्य सँवारे और मूल उद्देश्य सभी में एक ही था “श्री रामकाज” इसलिए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी लिखते हैं –
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे, रामचन्द्र के काज सँवारे॥
चौपाई ९ः सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा
अगली चौपाईः रविवार, 26 जुलाई 2026 को प्रकाशित की जाएगी।