चौपाई ९ः सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा - श्री हनुमान चालीसा चौपाई, अर्थ, भावार्थ और विस्तार

चौपाई ९ः सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥९॥

शब्दार्थः सूक्ष्म = बहुत छोटा, लघु। धरि = धारण करके। दिखावा = दिखाया। विकट = भयानक। लंक = लंका। जरावा = जलाया।

अर्थः आपने बहुत छोटा रूप धारण करके भगवती सीता माँ को दिखाया और भयंकर रूप धारण करके लंका को जलाया।

गूढ़ अर्थः गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने अब तक की चौपाइयों में प्रभु श्री हनुमानजी के मूल स्वरूप के बाह्य स्वरूप, आंतरिक स्वरूप तथा उनके स्वभाव का वर्णन किया। इस चौपाई में वे उनके विभिन्न रूपों का वर्णन प्रारंभ कर रहे हैं। प्रभु श्री हनुमानजी परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग रूप धारण करते हैं।

प्रभु श्री हनुमानजी को योग साधना से सभी सिद्धियां प्राप्त थीं। अणिमा सिद्धि के द्वारा वे अपने शरीर को चाहे जितना छोटा कर सकते थे, महिमा सिद्धि के द्वारा वे अपने शरीर को चाहे जितना बड़ा कर सकते थे, लघिमा सिद्धि से वे अपने आपको अत्यंत हल्का बना सकते थे एवं गरिमा सिद्धि से वे अपने आपको अत्यंत भारी बना सकते थे। वैसे भी आप श्री पवनपुत्र हैं और वायु का इतना संकोच संभव है कि उससे निर्मित कोई भी पिंड इतना छोटा हो सकता है कि लाखों गुना छोटा हो जाए और विस्तार होने पर इतना फैल सकता है कि लाखों गुना बड़ा हो जाए। श्रीरामचरितमानसजी के सुंदरकाण्ड में प्रभु श्री हनुमानजी ने अनेकों बार स्वयं को सूक्ष्म, विशाल, हल्का एवं भारी किया है।

समुद्र लांघने से पहले श्री जामवन्तजी प्रभु श्री हनुमानजी को अपना बल याद दिलाते हुए जैसे ही कहते हैं कि “रामकाज लगि तव अवतारा” यह सुनते ही प्रभु श्री हनुमानजी पर्वत के समान विशालकाय हो जाते हैं, यथा “सुनतहिं भयउ पर्बताकारा”। वजन इतना भारी कि “जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥” अर्थात जिस पर्वत के ऊपर से छलांग लगाई वह तुरंत पाताल में चला गया। समुद्र लांघते समय मार्ग में नागमाता सुरसा जब आपकी परीक्षा लेने आती है तब भी आप अपने शरीर का विस्तार एवं संकोच दिखाते हैं, यथा “जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥” लंका पहुँचने पर नगर में प्रवेश के लिए फिर छोटे बन जाते हैं, यथा “मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥” फिर लंकिनी को घूंसा मारते समय बड़े हो जाते हैं पुनः छोटा स्वरूप धारण करके लंका में भगवती सीता माता की खोज करते हैं। श्री विभीषणजी से मिलते समय विप्र रूप धारण करके जाते हैं एवं पुनः भगवती सीता माता से मिलने अशोक वाटिका में जाते समय सूक्ष्म रूप धारण कर लेते हैं। अशोक वाटिका में जब वृक्ष पर पत्तों के बीच जाकर छिपे तो वजन इतना हल्का कर लिया कि एक पत्ता तक न हिला, न गिरा। लंका दहन के समय पुनः विकट रूप धारण करते हैं एवं पुनः भगवती सीता माता के सम्मुख आने के लिए लघु रूप धारण कर लेते हैं। जहाँ जैसी परिस्थिति एवं आवश्यकता होती है आप वैसा ही रूप धारण कर लेते हैं।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावाः अशोक वाटिका में भगवती सीता माता के सम्मुख जाने से पहले प्रभु श्री हनुमानजी ने अत्यंत सूक्ष्म रूप धारण कर लिया। इसके कई कारण हैं, सर्वप्रथम तो व्यक्ति कितना भी बड़ा हो जाए लेकिन माता के सम्मुख जाना है तो छोटा बनकर ही जाना चाहिए। जो जीवन में छोटा बन सकता है वही जीवन में बड़ा बन सकता है। भगवती सीता माता भक्ति स्वरूपा हैं और जीवन में भक्ति की प्राप्ति करनी है तो स्वयं को छोटा बनाना जरूरी है और छोटा बनने के लिए अहंकार को गलाना पड़ता है।

प्रभु श्री हनुमानजी अगर माता के सम्मुख सूक्ष्म रूप धारण करके न जाते और मूल स्वरूप में ही जाते तो सोचिए माता ने इससे पहले न तो प्रभु श्री हनुमानजी को देखा था, न ही उनका परिचय माता को पता था। माता उन्हें मूल स्वरूप में देखकर असमंजस में पड़ जाती। श्री हनुमानजी ने माता के सम्मुख जाने से पहले बहुत विचार किया। श्रीमद्वाल्मिकीय रामायण के सुंदरकाण्ड का एक पूरा सर्ग 29 प्रभु श्री हनुमानजी के विचार पर ही केंद्रित है। प्रभु श्री हनुमानजी ने विचार किया कि मैं वानर हूँ, मनुष्यों के समान माता के सम्मुख संस्कृत बोलूंगा तो माता मुझे बहुरूपिया रावण समझकर डर जाएंगी, डर कर अगर उनकी चीख निकल गई तो राक्षस आ जाएंगे, युद्ध होगा और श्री रामकाज में बाधा आएगी।

शोक और विषादयुक्त भगवती सीता माता को पहले संवाद योग्य मनःस्थिति तक लाना था एवं उनका विश्वास भी पक्का करना था। इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी ने निश्चय किया कि मैं माता को पहले उन प्रभु श्री रामजी की कथा सुनाऊंगा जो उनके अपने हैं, जिनमें माता का मन रमा हुआ है, इससे माता के उद्विग्न होने की संभावना नहीं रहेगी। श्री रामकथा को सुनते ही माता का दुःख भाग गया और वे बोलीं “श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किन भाई॥ तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ ॥” अर्थात जिसने कानों के लिए अमृतरूप यह सुंदर कथा कही, हे भाई! वह प्रकट क्यों नहीं होता? तब प्रभु श्री हनुमानजी उनके पास चले गए। उन्हें देखकर भगवती सीता माता मुख फेरकर बैठ गईं। तब प्रभु श्री हनुमानजी ने अपना परिचय दिया –

राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥

अर्थात हे माता जानकी मैं प्रभु श्री रामजी का दूत हूँ। करुणानिधान की सच्ची शपथ लेकर कहता हूँ। फिर भी माता के मन में संशय रहा और उन्होंने पूछा कि नर और वानर का संग कैसे हुआ, तब प्रभु श्री हनुमानजी ने संग कैसे हुआ इसकी पूरी कथा कही। उनके प्रेमयुक्त वचन सुनकर भगवती सीता माता के मन में विश्वास उत्पन्न हो गया, उन्होंने जान लिया कि यह मन, वचन और कर्म से कृपा के सागर श्री रघुनाथजी का दास है। यथा - कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास। जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥

रावण की कैद में शोकग्रस्त भगवती सीता माता को शोक रहित करना, उनमें विश्वास भरना तत्पश्चात उन्हें प्रभु का संदेश एवं प्रभु के बल, प्रताप और सुयश का वर्णन सुनाना सहज नहीं था और इसी हेतु प्रभु श्री हनुमानजी ने माता के सम्मुख सूक्ष्म रूप धारण करके जाने का निर्णय लिया। इसलिए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी लिखते है – “सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा”।

बिकट रूप धरि लंक जरावाः जब प्रभु श्री हनुमानजी की पूंछ में आग लगाई गई तो पहले तो उन्होंने अपना रूप छोटा कर लिया, यथा – “पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघुरूप तुरंता॥” ताकि पहले बंधन से बाहर आ सकें। “निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं।” बंधन से निकलकर वे सोने की अटारियों पर जा चढ़े।

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥

उस समय प्रभु की प्रेरणा से उनचासों पवन चलने लगीं और प्रभु श्री हनुमानजी ने अपना विकट रूप प्रकट किया। प्रभु श्री हनुमानजी ने अट्टहास किया और इतना बड़ा स्वरूप धारण किया कि आकाश से जा लगे। उस रूप की जरा कल्पना कीजिए कि एक तो त्रिकूट पर्वत ऊँचा, उस पर स्थित लंका नगरी और भी ऊँची, उसमें भी रावण का महल सबसे ऊँचा और प्रभु श्री हनुमानजी उस महल के भी कँगूरे पर जाकर विशाल रूप धारण करके खड़े हो गए। सम्पूर्ण आकाश अग्निमय हो गया। गोस्वामी श्री तुलसीदासजी उस समय के प्रभु श्री हनुमानजी के रूप का वर्णन करते हुए श्री कवितावली के सुंदरकाण्ड में लिखते हैं –

‘तुलसी’ विराज्यो ब्योम बालधी पसारि भारी,
देखें हहरात भट, कालु सो कराल भो।।
तेजको निधानु मानो कोटिक कृसानु-भानु,
नख बिकराल, मुखु तेसो रिस लाल भो॥

अर्थात प्रभु श्री हनुमानजी उस समय बड़ी लंबी पूँछ पसारकर आकाश में जा लगे। उस समय उन्हें देखकर बड़े-बड़े योद्धा भी घबराने लगे। वे काल से भी कठोर, तेज पुंज से लग रहे थे, मानो करोड़ों अग्नि और सूर्यनारायण हैं। उनके नख विकराल थे और वैसा ही क्रोध से मुँह लाल था।

बालधी बिसाल बिकराल ज्वाल-जाल मानों,
लंक लीलिबेको काल रसना पसारी है।
कैधौं ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु,
बीररस बीर तरवारि सो उघारी है॥

अर्थात प्रभु श्री हनुमानजी की पूँछ से बड़ी विकराल आग की ज्वालाएँ निकल रही हैं, मानो लंका लील जाने को काल ने अपनी जीभ निकाल ली है, या मानो आकाशगंगा में बहुत से पुच्छल तारे भरे हैं, या वीररसधारी वीरों ने तलवार म्यान से बाहर निकाल ली है।

जिज्ञासु पाठक उस समय के प्रभु श्री हनुमानजी के अति विकराल रूप के बारे में श्रीकवितावली के सुंदरकाण्ड में विस्तार से पढ़ सकते हैं। गोस्वामी श्री तुलसीदासजी द्वारा रचित 'कवितावली' में भी 'श्रीरामचरितमानसजी' की तरह सात काण्ड हैं, इनमें प्रभु श्रीरामजी के जीवन, उनकी लीलाओं और महिमा का बहुत ही सुंदर काव्यात्मक वर्णन किया गया है। यह एक 'मुक्तक काव्य' है अर्थात इसमें घटनाओं का निरंतर या क्रमबद्ध वर्णन होने के बजाय प्रभु श्रीरामजी के चुने हुए प्रसंगों और उनकी महिमा का स्वतंत्र रूप से वर्णन किया गया है।

प्रभु श्री हनुमानजी ने अति विशाल देह धारण की परन्तु वह अत्यंत हल्की थी इसी से वे एक महल से दूसरे पर बड़ी तेजी से चढ़ जाते हैं, यथा - “देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥ जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥” अग्नि की करोड़ों भयंकर लपटों से पूरी लंका नगरी बेहाल हो गई। जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥ प्रभु श्री हनुमानजी ने एक ही क्षण में सारा नगर जला डाला। बस एक श्री विभीषणजी का घर नहीं जलाया॥ पूरी लंका को जलाकर भी प्रभु श्री हनुमानजी को अग्नि जला नहीं पाई क्योंकि प्रभु श्री हनुमानजी उनके दूत हैं जिन्होंने अग्नि को बनाया है। और इतना सब करने के बाद क्या किया – “पूँछ बुझाइ खोइ श्रम, धरि लघु रूप बहोरि।जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥” पूँछ बुझाकर, थकावट दूर करके और फिर छोटा-सा रूप धारण कर प्रभु श्री हनुमानजी भगवती जानकी माता के सामने हाथ जोड़कर जा खड़े हुए। माता से आज्ञा लेकर लघु रूप में चले और पुनः कार्य पूर्ण करके माता के सम्मुख लघु रूप मे आ गए। माता को उन्होंने कुछ नहीं बताया और हाथ जोड़कर ऐसे खड़े हो गए मानो कुछ किया ही न हो। प्रभु श्री हनुमानजी भक्ति के आगे एवं भक्तों के आगे तो छोटे बन जाते हैं लेकिन कोई रावण जैसा अभिमानी मिल जाए तो बड़े बन कर विकट रूप धारण कर लेते हैं।

इससे कितना बड़ा संकेत मिलता है कि प्रभु श्री हनुमानजी बड़ा-से-बड़ा काम करके भी विनम्र हैं, अभिमान रहित हैं और हमेशा यही कहते हैं कि “सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥” अर्थात हे श्री रघुनाथजी! यह सब तो आप ही का प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी बड़ाई कुछ भी नहीं है। इतनी दीनता प्रभु श्री हनुमानजी में हैं। भक्ति के आगे आप सूक्ष्म हैं और अभिमान के आगे आप विकट हैं। इसलिए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी लिखते हैं - सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥