चौपाई ८ः प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया - श्री हनुमान चालीसा चौपाई, अर्थ, भावार्थ और विस्तार

चौपाई ८ः प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥


शब्दार्थः प्रभु चरित्र = प्रभु श्री रामजी की कथा। सुनिबे को = सुनने के लिए। रसिया = रसिक। बसिया = बसाना।

अर्थः आप प्रभु श्री रामजी की कथा सुनने के रसिक हैं तथा प्रभु श्री रामजी, श्री लक्ष्मणजी एवं भगवती सीता माता को सदा अपने मन में बसाए रखते हैं।

गूढ़ अर्थः गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने प्रभु श्री हनुमानजी के मूल स्वरूप के बाह्य स्वरूप एवं आंतरिक स्वरूप का वर्णन पिछली चौपाइयों में किया। पिछली चौपाई में हमने देखा कि प्रभु श्री हनुमानजी विद्यावान हैं, अत्यंत ही गुणी एवं चातुर हैं और इन्हीं सब खूबियों का उपयोग करते हुए वे श्री राम-काज करने को अत्यंत आतुर हैं। इस चौपाई में गोस्वामीजी प्रभु श्री हनुमानजी के मूल स्वभाव का वर्णन करते हैं। प्रभु श्री हनुमानजी के मूल स्वभाव को समझाते हुए गोस्वामीजी श्री तुलसीदासजी कहते हैं कि आप प्रभु चरित्र (प्रभु श्री रामजी की कथा) सुनने के अत्यंत ही रसिक हैं। तो पहले तो आप अपना मुख्य कार्य श्री राम-काज करते हैं एवं बचे हुए समय में आप प्रभु के श्रीचरित्र सुनते हैं और केवल सुनते ही नहीं वरन् प्रभु श्री रामजी, श्री लक्ष्मणजी एवं भगवती माता सीता को अपने हृदय में बसाकर सुनते हैं।

प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु श्री रामजी की कथा सुनने के कितने रसिया हैं, इस बात को इस तथ्य से समझा जा सकता हैं कि उन्होंने प्रभु कथा सुनने के लिए तो स्वयं प्रभु के निज धाम श्री साकेत धाम जाने के सुख तक को ठुकरा दिया। प्रभु श्री रामजी जब मानवीय श्रीलीला संवर्धन करके अपने निज धाम श्री साकेत धाम को जाने लगे तो उन्होंने प्रभु श्री हनुमानजी से कहा आप भी सबके साथ हमारे धाम चलिए। प्रभु श्री हनुमानजी ने कहा कि प्रभु मैं तो चलने को तैयार हूँ लेकिन वहाँ आपकी कथा तो होती है ना? प्रभु ने कहा - नहीं, वहाँ कथा की क्या जरूरत है वहाँ तो हम स्वयं ही होते हैं। तो प्रभु श्री हनुमानजी ने कहा कि प्रभु आप चलिए मैं यहाँ आपकी कथा सुनकर आऊँगा। प्रभु ने कहा कि आप कब तक यहाँ रहेंगे तो प्रभु श्री हनुमानजी ने कहा कि जब तक आपकी कथा यहाँ रहेगी मैं भी यहीं रहूंगा।

प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु श्री रामजी की कथा ‘सुनिबे को रसिया’ हैं, सुनाने के नहीं। जरा विचार करिए कि जो स्वयं श्रीरामकथा के साक्षी रहे हैं, जिनके सम्मुख ही सब कुछ हुआ है, जो सब कुछ जानते हैं, फिर उनसे बेहतर कथा और कौन कह सकता है? साथ ही हम अपने आप पर ही लें कि अगर हमारे सम्मुख कोई प्रसंग घटित हो और कोई और व्यक्ति हमें वहीं सुनाने लगे तो क्या हम शांत रहकर सुन लेंगे, कभी नहीं, हम कहने वाले को बीच में रोककर, बार-बार टोककर अपना ज्ञान दिखाने का प्रयास करेंगे कि नहीं ऐसा नहीं हुआ था या ऐसा हुआ था। लेकिन प्रभु श्री हनुमानजी अत्यंत ही धैर्यवान है, कथा सुनते समय वे कुछ नहीं बोलते, वे तो प्रभु प्रेम में मग्न होकर केवल कथा सुनते हैं। कथा सुनते समय वे उसके भाव में खो जाते हैं, प्रभु को याद करके उनके नेत्र सजल हो जाते हैं, उनका रोम-रोम पुलकित हो जाता है और आखिर क्यों न हों, इसी आनंद के लिए तो उन्होंने श्री साकेत धाम जाने के सुख तक को त्याग दिया था।

एक शंका मन में आती है कि हम तो एक कथा एक-दो बार सुनकर ही अघा जाते हैं, फिर प्रभु श्री हनुमानजी को रस कैसे आता होगा तो उत्तर बड़ा सरल है –

राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥
जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥

अर्थात प्रभु श्रीरामजी के चरित्र सुनते-सुनते जो तृप्त हो जाते हैं, उन्होंने तो उसका विशेष रस जाना ही नहीं। जो जीवन्मुक्त महामुनि हैं, वे भी भगवान के गुण निरंतर सुनते रहते हैं। और वैसे भी प्रभु श्री रामजी के चरित्र अपार हैं। प्रभु श्री महादेवजी भगवती पार्वती माता को पूरी श्री रामकथा सुनाने के बाद कहते हैं – “राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा॥” अर्थात प्रभु श्रीरामजी के चरित्र अपार हैं, मैंने प्रभु श्रीरामजी के कुछ थोड़े से गुण ही बखान कर कहे हैं। उनका पूरा वर्णन कोई भी नहीं कर सकता।

एक शंका और मन में आ सकती है कि श्री रामकथा तो एक साथ अनेक स्थानों पर हो सकती है और होती ही है तो क्या प्रभु श्री हनुमानजी हर जगह जाते हैं? इसका उत्तर गोस्वामी श्री तुलसीदासजी “श्रीहनुमत्-स्तवन” की इन पंक्तियों में दे देते हैं कि -

यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं, तत्र तत्र कृतमस्तकांजलिम्।
वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम् ॥

अर्थात जहाँ-जहाँ प्रभु श्री रामजी की महिमा का गान होता है, वहाँ-वहाँ प्रभु श्री हनुमानजी हाथ जोड़े खड़े रहते हैं। उनकी आँखें प्रेमाश्रुओं से भरी होती हैं। यह बात गोस्वामी श्री तुलसीदासजी बिना कारण नहीं कह रहे हैं, इस बात को उन्होंने साक्षात अनुभव किया है। श्री भक्तमाल के ऊपर लिखी श्री प्रियादासजी की “भक्तिरसबोधिनी टीका” एवं श्री सीतारामशरणजी की “भक्तिसुधास्वाद” में अग्रलिखित कथा प्रसंग प्राप्त होता है।

गोस्वामी श्री तुलसीदासजी जब श्री काशीजी में रहते थे तो शौच के लिए नदी के पार जाते थे। वापसी में जो जल बचता था उसे एक कंटकी बेर के वृक्ष में रोज डाल दिया करते थे। उस वृक्ष पर एक प्रेत रहता था और रोज उस पानी को पी लेता था क्योंकि प्रेत केवल अशुद्ध पानी ही पीते हैं। एक दिन वह प्रेत प्रकट हुआ और बोला कि “मैं आपके पानी देने से प्रसन्न हूँ, कुछ मांगिए।” श्री तुलसीदासजी ने कहा कि “मुझे केवल प्रभु श्री रामजी के दर्शन करा दो, मुझे और कुछ नहीं चाहिए”। प्रेत ने कहा कि इतनी शक्ति तो मुझमें नहीं है लेकिन मैं आपको प्रभु श्री हनुमानजी का पता बताता हूँ, वे आपको प्रभु के दर्शन करा देंगे। और फिर उस प्रेत ने श्री तुलसीदासजी को प्रभु श्री हनुमानजी की पहचान बताई कि अमुक स्थान पर श्री रामकथा चल रही है वहाँ प्रभु श्री हनुमानजी अति दीन मलीन कोढ़ी का रूप धारण करके आते हैं ताकि कोई पहचान न सके। कथा में सबसे पहले आते हैं, सबसे अंत में जाते हैं। भीड़ से अलग सबसे अंत में बैठते हैं, सजल नेत्रों से पूरी कथा एकाग्र होकर सुनते हैं, जब वे जाने लगें तब तुम उनके चरण पकड़ लेना। इस प्रकार गोस्वामी श्री तुलसीदासजी को प्रभु श्री हनुमानजी के दर्शन हुए और फिर उनके माध्यम से प्रभु श्री रामजी के दर्शन हुए।

जिस व्यक्ति का प्रेम जिस चीज में होता है वह वहीं पाया जाता है, उसी को प्राप्त करने को आतुर रहता है, उस वस्तु के बिना रह ही नही सकता इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी को खोजना हो तो उन्हें वहीं खोजना होगा जहाँ उनका अनुराग है अर्थात वे वहीं पाए जाते हैं जहाँ श्री रामकथा होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी लिखते हैं “प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया”।

राम लखन सीता मन बसियाः प्रभु श्री हनुमानजी “राम-लखन-सीता” को अपने हृदय में बसाकर रखते हैं। प्रभु श्री रामजी ज्ञान स्वरूप हैं, श्री लक्ष्मणजी वैराग्य स्वरूप हैं एवं भगवती सीता माता भक्ति स्वरूपा हैं। इस प्रकार प्रभु श्री हनुमानजी ज्ञान-भक्ति-वैराग्य को अपने हृदय में धारण करके रखते हैं। गोस्वामी श्री तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानसजी में लिखते हैं –

बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी॥
राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई॥

अर्थात इन तीनों की जोड़ी इतनी मनोहर हैं कि उसका वर्णन ही संभव नहीं हैं, क्योंकि शोभा बहुत अधिक है और मेरी मति बहुत थोड़ी है। प्रभु श्री रामजी, श्री लक्ष्मणजी और भगवती सीताजी की सुंदरता को सब लोग मन, चित्त और बुद्धि तीनों को लगाकर देख रहे हैं।

चित्त का काम है चिंतन करना, मन का काम है संकल्प-विकल्प करना और बुद्धि का काम है इन संकल्प-विकल्प पर विचारपूर्वक निर्णय लेना। जब ये तीनों अपना काम छोड़कर प्रभु की ओर देखते हैं तब जाकर मन प्रभु में एकाग्र होता है। अंतःकरण में मुख्य रूप से चार चीजें आती हैं, यथा मन, चित्त, बुद्धि और अहंकार। जब मन, चित्त और बुद्धि प्रभु में लग जाते हैं तो अहंकार का स्वतः ही लोप हो जाता है और प्रभु श्री हनुमानजी ने तो प्रभु को मन में बसा लिया। जब हृदय में भक्ति-ज्ञान-वैराग्य बस जाते हैं तो मन निर्मल हो जाता है और वहाँ प्रभु का निवास हो जाता है।

इस पंक्ति का एक और अर्थ निकलता है कि “राम-लखन-सीता” के ‘मन-बसिया’ हैं अर्थात आप प्रभु श्री रामजी, श्री लक्ष्मणजी एवं भगवती सीता माता तीनों के हृदय में निवास करते हैं। प्रभु श्री रामजी कहते हैं “सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥” श्री लक्ष्मणजी कहते हैं कि आपने संजीवनी लाकर मुझे फिर से प्रभु से मिला दिया, मैं आपका ऋणी हूँ। भगवती सीता माता भी कहती हैं “का देउँ तोहि त्रैलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा॥”। तीनों ही अपने हृदय में आपको बसाकर रखते हैं। प्रभु तो यहाँ तक कह देते हैं कि “तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई”। इतना प्रेम तीनों, प्रभु श्री हनुमानजी से करते हैं। इसलिए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी प्रभु श्री हनुमानजी के लिए लिखते हैं - राम लखन सीता मन बसिया”।