बिद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥७॥
शब्दार्थः बिद्यावान = विद्या के भण्डार। गुनी = गुणों के भण्डार। अति = बहुत। चातुर = कार्यकुशल, अत्यंत बुद्धिमान। करिबे को = करने के लिए। आतुर = उत्सुक, तत्पर।
अर्थः आप प्रकांड विद्या निधान हैं, गुणवान और अत्यंत कार्यकुशल हैं तथा प्रभु श्री रामजी के काज करने के लिए सदा आतुर रहते हैं।
गूढ़ अर्थः पिछली चौपाई से गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने प्रभु श्री हनुमानजी के मूल स्वरूप के आंतरिक स्वरूप का वर्णन प्रारंभ किया था, जिसके अंतर्गत हमने देखा था कि प्रभु श्री हनुमानजी तेज और प्रताप के निधान हैं एवं आपका महान यश जगत में फैला हुआ है। इस चौपाई में गोस्वामी श्री तुलसीदासजी आपको विद्यावान, गुणी एवं चतुर बताते हैं। गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने चौपाई ५ हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै में बताया था कि प्रभु श्री हनुमानजी मूँज का जनेऊ धारण करते हैं, तो पहले बताया कि आपका उपनयन संस्कार हो चुका है, फिर समस्त विद्याओं की प्राप्ति बताई क्योंकि शास्त्रानुसार वेद-पुराणों के अध्ययन का अधिकार केवल उसी को है जिसका यज्ञोपवीत संस्कार हो चुका हो।
बिद्यावानः याज्ञवल्क्यस्मृति के अनुसार विद्याएँ प्रायः चौदह मानी जाती हैं, यथा – “पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्रांगमिश्रिताः। वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश॥” अर्थात पुराण (अठारह पुराण), न्याय (तर्कविद्यारूप), मीमांसा (वेदवाक्य का विचार), धर्मशास्त्र (मनुस्मृति आदि), छः वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष) एवं चार वेद – ये मिलाकर चौदह विद्याएँ हैं। जहाँ विद्या नहीं है वहाँ अविद्या है लेकिन दोनों में भेद है, यथा – “एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा॥ एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥” अर्थात एक (अविद्या) दुष्ट (दोषयुक्त) है और अत्यंत दुःखरूप है, जिसके वश होकर जीव संसाररूपी कुएँ में पड़ा हुआ है और एक (विद्या) जिसके वश में गुण है और जो जगत की रचना करती है, वह प्रभु से ही प्रेरित होती है, उसका अपना बल कुछ भी नहीं है।
प्रभु श्री हनुमानजी विद्यावान हैं और क्यों हैं क्योंकि उनमें उपरोक्त सभी विद्याएँ तो हैं ही पर उससे भी ऊपर “हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या॥” अर्थात जो प्रभु के सेवक होते हैं, भक्त होते हैं उनको अविद्या नहीं व्यापती, प्रभु की प्रेरणा से वे विद्यावान होते हैं और प्रभु श्री हनुमानजी तो दास भक्ति के आदर्श हैं सो उनका विद्यावान होना प्रभु प्रेरणा से स्वाभाविक ही है।
उपरोक्त चौदह विद्याएँ प्राप्त कर लेने पर भी व्यक्ति विद्वान तो हो सकता है लेकिन विद्यावान नहीं। विद्यावान होने के लिए एक और योग्यता गोस्वामी श्री तुलसीदासजी बताते हैं – “ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं॥ कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥” अर्थात ज्ञान (विद्यावान) वह है, जिसमें मान आदि एक भी दोष नहीं है और जो सबमें समान रूप से ब्रह्म को देखता है। परम वैराग्यवान वही है जो सारी सिद्धियों को और तीनों गुणों को तिनके के समान त्याग चुका हो।
विद्वान और विद्यावान में अंतर होता है। रावण विद्वान था और प्रभु श्री हनुमानजी विद्यावान। रावण ने शांतिस्वरूपा भगवती सीता माता का हरण किया और प्रभु श्री हनुमानजी ने शांतिस्वरूपा भगवती सीता माता को खोजकर फिर प्रभु श्री रामजी से मिलवाया। प्रभु श्री हनुमानजी लंका गए, रावण को समझाने का प्रयास किया लेकिन रावण में अहंकार था, यथा –
“कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥”
“बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥”
“मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥”
और प्रभु श्री हनुमानजी विनम्र थे, यथा –
“खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥”
“सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥”
“बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥”
रावण प्रभु श्री हनुमानजी को खल, अधम संबोधित करता है और प्रभु श्री हनुमानजी रावण को प्रभु, स्वामी संबोधित करते हैं। प्रभु श्री हनुमानजी अत्यंत बलवान होकर भी हाथ जोड़ते हैं, विनती करते हैं, भय के कारण नहीं वरन्, इस भाव के कारण कि “सियाराम मय सब जग जानी”। प्रभु श्री हनुमानजी स्वयं रुद्रावतार हैं और रावण प्रभु श्री महादेवजी का शिष्य था लेकिन वे गुरु होकर भी प्रभु का भाव करके शीश झुका लेते हैं। जो शत्रु में भी अपने प्रभु को देखे वो विद्यावान हैं।
विद्या प्राप्त करके जो अभिमानी हो जाए वो विद्वान हैं और विद्या प्राप्त करके जो विनम्र हो जाए वो विद्यावान है, यथा – “विद्या ददाति विनयं” तथा “विद्या विनय संपन्ने”। प्राप्त किए हुए ज्ञान को जो स्वयं भी जीवन में उतार ले और दूसरों को भी बाँटे, वही विद्यावान है। जो खुद भी हृदय में प्रभु को बैठाए और दूसरों को भी ऐसा ही करने की प्रेरणा दे, वही विद्यावान है। प्रभु श्री हनुमानजी रावण को समझाते हुए कहते हैं कि “राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥” इसलिए प्रभु श्री हनुमानजी विद्यावान हैं। प्रभु श्री रामजी विद्यानिधि हैं, यथा “बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही॥” और प्रभु श्री हनुमानजी अपने हृदय में उन्हें धारण करते हैं सो इस नाते भी आप विद्यावान हैं। विद्यावान होने से ही आप ‘ज्ञानिनामग्रगण्यम्’ हैं।
गुनी अतिः प्रभु श्री हनुमानजी सकलगुणनिधानं हैं। भगवती सीता माता के आशीर्वाद से आपमें सकल सदगुण निवास करते हैं, यथा “अजर अमर गुननिधि सुत होहू।” एवं “सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत।” चौपाई १ जय हनुमान ज्ञान गुन सागर में हम प्रभु श्री हनुमानजी के गुणों का वर्णन विस्तार से देख चुके हैं। वैसे तो प्रकृति का नियम है कि किसी भी प्राणी में सभी गुण एक साथ रह ही नहीं सकते, सृष्टि स्वयं ही गुण दोषमयी है लेकिन प्रभु श्री हनुमानजी विद्यावान भी हैं और अत्यंत गुणवान भी हैं।
अति चातुरः प्रभु श्री हनुमानजी अत्यंत चतुर (बुद्धिमतां वरिष्ठं) हैं। जो समय, काल और परिस्थिति के अनुसार व्यवहार करे वो चतुर हैं। कई बार लोग चालाकी को ही चतुराई समझ लेते हैं, लेकिन यहाँ बात चालाकी की नहीं हो रही है, वरन् श्रीरामचरितमानसजी में तो चालाकी छोड़ने की बात कही गई है, यथा “मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई। भजत कृपा करिहहिं रघुराई॥” अर्थात मन, वचन और कर्म से चतुराई (चालाकी) छोड़कर भजते ही श्री रघुनाथजी कृपा करेंगे। चतुराई से यहाँ तात्पर्य कार्यकुशल होने से है। कब सूक्ष्म रूप धारण करना है, कब विकट रूप धारण करना है, कब भीम रूप धारण करना है, कब लंका जलाना है, कब मुद्रिका डालनी है, प्रभु श्री हनुमानजी भलीभाँति जानते हैं। लेकिन फिर भी यह चातुर शब्द का शाब्दिक अर्थ हुआ। चातुर शब्द का आध्यात्मिक अर्थ बहुत ही अलग है। गोस्वामी श्री तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानसजी में लिखते हैं –
कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप।
परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर॥
अर्थात यह कठिन कलिकाल पापों का खजाना है, इसमें न धर्म है, न ज्ञान है और न योग तथा जप ही है। इसमें तो जो लोग सब भरोसों को छोड़कर श्री रामजी को ही भजते हैं, वे ही चतुर हैं। इसलिए प्रभु कहते हैं कि “सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥” श्रीमद्भगवद्गीताजी के १८वें अध्याय में भी प्रभु लिखते हैं – “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।” जो पूर्ण रूप से प्रभु के शरणागत हो जाता है वही चतुर है। गोस्वामी श्री तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानसजी में लिखते हैं -
राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें॥
चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं॥
अर्थात श्री रामभक्तिरूपी मणि जिसके हृदय में बसती है, उसे स्वप्न में भी लेशमात्र दुःख नहीं होता। जगत् में वे ही मनुष्य चतुरों के शिरोमणि हैं जो उस भक्तिरूपी मणि के लिए भलीभाँति यत्न करते हैं। तो प्रभु श्री हनुमानजी तो ‘राम-लखन-सीता मन बसिया’ हैं ही और इसलिए (बुद्धिमतां वरिष्ठं) हैं। इसी से गोस्वामी श्री तुलसीदासजी आपको ‘अति चातुर’ विशेषण देते हैं।
राम काज करिबे को आतुरः प्रभु श्री हनुमानजी का अवतार ही राम-काज के लिए हुआ है, इसलिए जहाँ भी प्रभु श्री रामजी का कार्य होता है वे अति शीघ्रता से उसे पूरा करते हैं। जब भगवती सीता माता की खोज के लिए जाने से पहले सब वानर प्रभु से मिलने आए, तब प्रभु श्री हनुमानजी सबसे अंत में प्रभु को प्रणाम करने आए। “जानि काज प्रभु निकट बोलावा” प्रभु ने कार्य का विचार करके उन्हें अपने पास बुलाया, अपना सेवक जानकर उन्हें अपनी मुद्रिका दी और कहा “बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु॥” अर्थात बहुत प्रकार से सीता को समझाना और मेरा बल तथा विरह (प्रेम) कहकर तुम शीघ्र लौट आना।
समुद्र पार करने की बारी आई और जब कोई न मिला तो श्री जामवन्तजी ने आपको अपना बल याद दिलाते हुए कहा कि “राम काज लगि तव अवतारा” तो तुरंत ही प्रभु श्री हनुमानजी पर्वताकार हो गए, वैसे भी श्री जटायुजी के भाई सम्पाती ने कहा था “जो नाघइ सत जोजन सागर। करइ सो राम काज मति आगर॥” अर्थात जो सौ योजन समुद्र लाँघ सकेगा और बुद्धिनिधान होगा, वही प्रभु श्री रामजी का कार्य कर सकेगा। समुद्र पार करते समय सबसे पहले मैनाक पर्वत आया और उन्हें विश्राम करने के लिए कहा तो “राम काज कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम” कहकर प्रणाम करके आगे बढ़ गए।
फिर उनकी परीक्षा लेने नाग माता सुरसा आई, उन्होंने आशीर्वाद दिया कि “राम काजु सबु करिहहु” फिर आगे लंकिनी ने भी कहा “प्रबिसि नगर कीजे सब काजा”। अब प्रभु श्री हनुमानजी सोचने लगे कि प्रभु ने तो कहा था कि माता को अनेक प्रकार से समझाकर लौट आना तो सब लोग और किस काज के लिए कह रहें हैं तभी आगे उन्होंने त्रिजटा को अपने स्वप्न के बारे में सुनाते हुए सुना कि “सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी” प्रभु श्री हनुमानजी तुरंत इशारा समझ गए कि आगे क्या करना हैं क्योंकि वे तो राम-काज करिबे को आतुर हैं। इस पूरे प्रसंग में सब जगह केवल राम-काज की ही चर्चा हुई है क्योंकि श्री राम-काज ही प्रभु श्री हनुमानजी का काम-काज है। हमें भी अपने कार्य को प्रभु का कार्य समझकर ही करना चाहिए।
गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने “बिद्यावान गुनी अति चातुर” को राम-काज के साथ ही क्यों जोड़ा क्योंकि प्रभु श्री हनुमानजी ने राम-काज करने में इन विशेषताओं का पग-पग पर अनेकानेक बार उपयोग किया। स्वयं ‘ज्ञानिनामग्रगण्यम्’ होने पर भी आपने श्री जामवन्तजी से सलाह मांगी “जामवन्त मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही॥” क्योंकि आप विद्यावान हैं। रावण ने अशोक वाटिका में भगवती सीता माता को डराया तो भी संयम का परिचय देते हुए “तरु पल्लव महँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥” क्योंकि आप गुणवान हैं। नागमाता सुरसा को अपनी चतुराई से जीता। श्री राम-काज करने के लिए आप नागपाश में भी बंध गए “प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा” अन्यथा प्रभु श्री महादेवजी कहते हैं कि जिन प्रभु का नाम जपकर मनुष्य संसार के सारे बंधनों से मुक्त हो जाते हैं, उनका दूत भी कहीं बंधन में आ सकता है। प्रभु श्री हनुमानजी यही कहते हैं कि “मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥”।
प्रभु श्री हनुमानजी अपनी सारी चतुराई, सदगुण, शक्ति, प्रतिभा, विशेषताओं का प्रयोग श्री राम-काज के लिए करते हैं और इसी में उनके होने की सार्थकता भी हैं। इसलिए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी कहते हैं कि जो राम-काज करने को आतुर है, वहीं विद्यावान, गुणी और चातुर हैं। हमारे अंदर भी अगर प्रभु कृपा से कोई योग्यता है, कोई गुण है, कोई कौशल है, तो उसे किसी-न-किसी रूप में प्रभु सेवा में जरूर समर्पित करना चाहिए।
चौपाई ६: संकर सुवन केसरीनंदन
अगली चौपाईः Will be Posted on Sunday, June 14, 2026