तेज प्रताप महा जग बंदन ॥६॥
शब्दार्थः सुवन = पुत्र, अवतार। तेज = ओज, आभा, कांति। प्रताप = पराक्रम, महिमा, प्रभाव। महा = महान्। बंदन = वंदित, पूजित।
अर्थः हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसारभर में वंदना होती है।
गूढ़ अर्थः पिछली दो चौपाइयों में गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने प्रभु श्री हनुमानजी के मूल स्वरूप का वर्णन किया था। मूल स्वरूप में भी हमने अभी तक बाह्य स्वरूप का वर्णन देखा कि प्रभु श्री हनुमानजी का वर्ण कंचन है, वे सुबेस धारण करते हैं, कानों में कुंडल धारण करते हैं तथा आपके केश घुंघराले हैं, एक हाथ में गदा तथा एक हाथ में ध्वजा धारण करते हैं, कंधे पर मूँज का जनेऊ धारण करते हैं। इस चौपाई से गोस्वामी श्री तुलसीदासजी प्रभु श्री हनुमानजी के मूल स्वरूप के आंतरिक स्वरूप का वर्णन प्रारंभ कर रहे हैं, जिसके अंतर्गत इस चौपाई में हम उनके तेज और प्रताप को देखेंगे।
संकर सुवनः देवर्षि श्री नारदजी ने प्रभु श्री विष्णुजी को श्राप दिया था कि – “कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥” अर्थात तुमने हमारा रूप बंदर का-सा बना दिया, इससे बंदर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। देवर्षि श्री नारदजी का यह श्राप ही प्रभु श्री विष्णुजी के श्रीरामावतार का एक हेतु बना। जब प्रभु के अवतार का समय आया तो प्रभु श्री ब्रह्माजी ने सभी देवताओं से कहा कि “बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ॥” अर्थात आप सभी वानरों का शरीर धर-धरकर पृथ्वी पर जाकर भगवान के चरणों की सेवा करो। जब प्रभु श्री महादेवजी ने देखा कि प्रभु का श्री रामावतार हो रहा है तो उनके हृदय में गहन प्रेम उमड़ पड़ा। उन्होंने निश्चय किया कि मैं केवल दर्शन ही नहीं, बल्कि उनकी सेवा भी करूँगा।
प्रभु का श्रीरामावतार ही प्रभु श्री शंकरजी के “हनुमंत अवतार” का हेतु बना। यहीं से श्री रुद्रावतार की कथा प्रारंभ होती है। इसलिए श्रीरामचरितमानसजी में आता है कि “रामकाज लगि तव अवतारा” अर्थात प्रभु श्री हनुमान का अवतार ही श्री रामकाज के लिए हुआ था। गोस्वामी श्री तुलसीदासजी श्री दोहावली में लिखते हैं – “जेहि सरीर रति राम सों, सोइ आदरहिं सुतान। रुद्र देह तजि नेह बस, संकर भे हनुमान॥” अर्थात चतुर लोग उसी शरीर का आदर करते हैं, जिस शरीर से प्रभु श्री रामजी में प्रेम होता है। इस प्रेम के कारण ही प्रभु श्री शंकरजी अपनी रुद्र देह को त्यागकर प्रभु श्री रामजी की सेवा के लिए प्रभु श्री हनुमानजी बन गए। “जनि राम सेवा सरस समुझि करब अनुमान । पुरखा ते सेवक भए हर ते भे हनुमान॥” प्रभु श्रीरामजी की सेवा का रस लेने एवं उनकी अनन्य भक्ति के आनन्द का अनुभव करने प्रभु श्री शंकरजी रुद्र रूप में प्रभु श्रीरामजी के अनन्य सेवक ‘हनुमान’ बने। प्रभु श्री हनुमानजी रुद्रावतार हैं, अत: उन्हें गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ‘संकर सुवन’ कह कर पुकारते हैं। ‘संकर’ शब्द प्रभु श्री शंकरजी तथा ‘सुवन’ शब्द पुत्र रूप में अवतार की अभिव्यक्ति करता है।
केसरी नंदनः प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु श्री महादेवजी के अंशावतार हैं। चौपाई २ में अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा के अंतर्गत हम पूर्व में प्रभु श्री हनुमानजी के जन्म की कथा देख चुके हैं। भगवती अंजनी माता ने वानरी के रूप में कुंजर नाम के वानर के यहाँ जन्म लिया फिर वानरराज श्री केसरीजी से आपका विवाह हुआ। सुखपूर्वक बहुत दिन बीत जाने पर भी उन्हें कोई संतान नहीं हुई । भगवती अंजनी माता ने पुत्र प्राप्ति की कामना से प्रभु श्री शंकरजी को प्रसन्न करने के लिए कड़ी तपस्या की। उनके कड़े तप से प्रसन्न होकर प्रभु श्री शंकरजी ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें वरदान मांगने को कहा । तब भगवती अंजना माता ने प्रभु श्री शंकरजी के सदृश पुत्र प्राप्ति की प्रार्थना की । तब प्रभु श्री शंकरजी ने आशीर्वाद दिया कि, “रुद्रगण में से ग्यारहवें महारुद्र तुम्हारे पुत्र होंगे”।
प्रभु श्री शंकरजी के तेज को श्री पवनदेव ने श्रवण मार्ग से भगवती अंजनी माता के गर्भ में स्थापित किया और उन्हीं से प्रभु श्री हनुमानजी का जन्म हुआ। भगवती अंजनी माता के गर्भ से प्रकट होने के कारण प्रभु श्री हनुमानजी वानरराज श्री केसरीजी के क्षेत्रज पुत्र ‘केसरीनंदन’ कहलाए। श्री पवनदेवजी की कृपा से महाबलशाली, महापराक्रमी, महातेजस्वी पुत्र की प्राप्ति भगवती अंजना माता को हुई इसलिए आप श्री पवनदेव के औरस पुत्र ‘पवनपुत्र’ कहलाए। उपरोक्त कथा के अनुसार ही प्रभु श्री हनुमानजी संकरसुवन, रुद्रावतार, पवनपुत्र, अंजनीपुत्र, अंजनीनंदन, केसरीनंदन आदि विभिन्न नामों से जाने जाते हैं। इस प्रकार ज्ञान की दृष्टि से आप ‘संकर सुवन’ हैं, उपासना की दृष्टि से आप ‘पवनपुत्र’ हैं, सांसारिक दृष्टि से आप ‘केसरीनंदन’ हैं। और इन सब से ऊपर भक्ति और शरणागति की दृष्टि से आप प्रभु श्री रामजी के मानस पुत्र हैं, यथा “सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥”
तेज प्रताप महा जग बंदनः प्रभु श्री हनुमानजी के लिए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी लिखते हैं कि आपके तेज, प्रताप और महान यश की संसारभर में वंदना होती है। लंकादहन के समय प्रभु श्री हनुमानजी के तेजस्वी स्वरूप का वर्णन करते हुए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी कवितावली में लिखते हैं – “तेज को निधान मानो कोटिक कृसानु भानु, नख बिकराल, मुखु तेसो रिस लाल भो।” अर्थात प्रभु श्री हनुमानजी का शरीर उस समय इतना तेजस्वी और विराट लग रहा था, मानो करोड़ों अग्नि और करोड़ों सूर्य एक साथ मिल गए हों। उनके नख तेजस्वी थे और गुस्से के कारण उनका मुख लाल हो गया था। तेज वह है जिसे देखकर ही शत्रु काँप जाए, आँखे सामना न कर सकें।
श्रीरामचरितमानसजी में वर्णन आता है “कनक बरन तन तेज बिराजा” अर्थात आप कंचन वर्ण (स्वर्णशैलाभदेहं) हैं तथा आपके शरीर पर तेज सुशोभित है। सोना अग्नि में नहीं जलता और न ही किसी विकार को प्राप्त होता है, वरन अग्नि के संग से और निखर कर कुंदन हो जाता है। इसलिए लंकादहन के समय आप स्वयं नहीं जले बल्कि आपका तेज और कांति और बढ़ गई। और यह तेज आखिर किस बात का है तो “मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥” प्रभु श्री रामजी का काज करने की प्रसन्नता और उसी का तेज है।
तीन ही पदार्थ तेजोमय माने गए हैं – सूर्य, अग्नि और चंद्रमा। सूर्य और अग्नि तापदायक हैं और चंद्रमा शीतलता प्रदान करने वाला है। सूर्य को प्रभु श्री हनुमानजी खेल खेल में निगल गए थे, अग्नि उन्हें जला नहीं सकी थी और ऐसा क्यों क्योंकि जिन्होंने अग्नि को बनाया प्रभु श्री हनुमानजी उनके दूत हैं, यथा “ताकर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥” प्रभु श्री हनुमानजी उन प्रभु श्री रामजी के सेवक हैं जिनका स्वयं का तेज ऐसा है कि “राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥” अर्थात प्रभु श्री रामचंद्रजी के तेज, बल और बुद्धि की अधिकता को लाखों शेष भी नहीं गा सकते। शतकोटि सूर्य, अग्नि और चंद्रमा मिलकर भी प्रभु श्रीरामजी के तेज की लेशमात्र भी बराबरी नहीं कर सकते। इसलिए प्रभु श्री महादेवजी कहते हैं कि “उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥” और प्रभु श्री हनुमानजी भी स्वयं कहते हैं कि “सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥”
प्रभु श्री हनुमानजी इतने अभिमानरहित हैं कि भगवती सीता माता को स्वयं के बारे में बताते हुए कहते हैं – “सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥” अर्थात हे माता! हम वानरों में बहुत बल या बुद्धि नहीं है। लेकिन प्रभु श्री रामचंद्रजी के प्रताप से, एक बहुत छोटा सा साँप (अत्यंत निर्बल प्राणी) भी गरुड़ (अत्यंत बलवान) को खा सकता है।
जगत में वंदनीय हो जाना कितना कठिन है इसका वर्णन करते हुए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी लिखते हैं “साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥ जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥" अर्थात संतों का चरित्र कपास के चरित्र के समान है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है। कपास की डोडी नीरस होती है, संत चरित्र में भी विषयासक्ति नहीं है, कपास उज्ज्वल होता है, संत का हृदय भी अज्ञान और पापरूपी अंधकार से रहित होता है, और कपास में गुण (तंतु) होते हैं, इसी प्रकार संत का चरित्र भी सद्गुणों का भंडार होता है, इसलिए वह गुणमय है। जैसे कपास का धागा सुई के किए हुए छेद को अपना तन देकर ढँक देता है, उसी प्रकार संत स्वयं दुःख सहकर दूसरों के दोषों को ढँकता है, जिसके कारण वे जगत में वंदनीय होते हैं।
प्रभु श्री हनुमानजी केवल ‘प्रभु’ नहीं वरन ‘महाप्रभु’ हैं, प्रभु श्री महादेवजी के अवतार हैं, इसलिए वे केवल ‘जग वंदन’ नहीं ‘महा जग वंदन’ हैं। श्री संकटमोचन हनुमानाष्टक के अनुसार –
काज किए बड़ देवन के तुम, बीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसे नहिं जात है टारो।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होए हमारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।
प्रभु श्री हनुमानजी अपना संपूर्ण तेज और प्रताप श्रीरघुबर का मानते हैं और इसलिए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी लिखते हैं “तेज प्रताप महा जग बंदन” अर्थात श्रीरघुबर के प्रताप से महाप्रभु श्री हनुमानजी जगत में वंदनीय हुए और उनका महान यश संसार में फैला।
चौपाई ५ः हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै
अगली चौपाईः Will be Posted on Sunday, May 31, 2026