श्री हनुमान चालीसा जी - सम्पूर्ण सरल व्याख्या

जय श्री राम
श्री हनुमान चालीसा जी प्रभु श्री हनुमानजी की महिमा का अद्भुत स्तुति ग्रंथ है, जिसे गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने रचा है। इसमें 40 चौपाइयाँ हैं, जिनमें प्रभु श्री हनुमान जी की भक्ति, बल, बुद्धि और सेवा भाव का सुंदर वर्णन किया गया है।

श्री हनुमान चालीसा जी का पाठ करने से मन में साहस, आत्मविश्वास और शांति का अनुभव होता है। यह हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति, निःस्वार्थ सेवा और प्रभु के प्रति प्रेम से जीवन में आने वाली कठिनाइयों को भी आसानी से पार किया जा सकता है। यदि हम इसके अर्थ को समझकर इसका पाठ करें, तो यह हमारे जीवन को भक्तिसकारात्मकता और शक्ति से भर देता है।

इस वेबसाइट पर श्री हनुमान चालीसा जी की हर चौपाई को बहुत ही आसान भाषा में समझाया गया है, ताकि कोई भी व्यक्ति इसे बिना कठिनाई के समझ सके। यहाँ आपको हर चौपाई का सरल अर्थ, गुढ़ अर्थ, आध्यात्मिक भाव और उसका महत्व सीधे और सरल शब्दों में मिलेगा। हमारा प्रयास है कि आप श्री हनुमान चालीसा जी को केवल पढ़ें ही नहीं, बल्कि उसे अच्छी तरह समझ भी सकें

सभी चौपाइयों को क्रम से और विस्तार से समझाया गया है, ताकि आपको पूरी श्री हनुमान चालीसा जी का अर्थ धीरे-धीरे और स्पष्ट रूप से समझ में आए। अगर आप श्री हनुमान चालीसा जी को आसान और सही अर्थ में समझना चाहते हैं, तो यह वेबसाइट आपके लिए बहुत उपयोगी है।

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अगली चौपाईः रविवार, 06 सितंबर 2026 को प्रकाशित की जाएगी।

चौपाई १२ः रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥

शब्दार्थः रघुपति = रघुकुल के स्वामी। कीन्ही = की। बड़ाई = प्रशंसा। मम = मेरे। भरतहि सम = भरत के समान।

अर्थः प्रभु श्री रामजी ने प्रभु श्री हनुमानजी की बहुत प्रशंसा की और कहा कि तुम मुझे भरत भाई के समान ही प्रिय हो ।

गूढ़ अर्थः पिछली चौपाई से गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने प्रभु श्री हनुमानजी के प्रमुख कार्यों का वर्णन प्रारंभ किया था। जिसके अन्तर्गत हमने श्री लक्ष्मणजी को वीरघातिनी शक्ति लगने के प्रसंग को विस्तार से देखा था। यह चौपाई भी उसी प्रसंग के गूढ़ भाव को प्रकट करती है। इस चौपाई को समझने के लिए हमें पुनः थोड़ा पीछे जाना होगा, जब प्रभु श्री हनुमानजी पूरा द्रोणाचल उखाड़कर पुनः लंका की ओर चले और जाते समय श्री अयोध्याजी के ऊपर से निकले।

श्री भरतजी ने अर्धरात्रि में आकाश में अत्यंत विशाल स्वरूप देखा जिसने हाथ में पूरा पर्वत उठा रखा था। श्री भरतजी को शंका हुई कि कहीं कोई निशाचर श्री अयोध्याजी पर पर्वत से हमला करने तो नहीं आया। केवल अनुमान था इसलिए बिना फर (नोक) का बाण मारा और प्रभु श्री हनुमानजी हे राम! हे रघुनायक! कहते-कहते गिरे और मूर्छित हो गए। प्रभु श्री रामजी का नाम सुनते ही श्री भरतजी व्याकुल हो गए क्योंकि “राम राम रघुनायक” तो वे प्रिय वचन हैं जिनका जाप श्री भरतजी स्वयं करते हैं, यथा “राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात॥

अत्यंत आतुर होकर श्री भरतजी ने दौड़ लगाई कि मुझसे एक श्रीरामभक्त का अपराध हो गया। प्रभु श्री हनुमानजी को मूर्छित देखकर श्री भरतजी दुःखी मन से बोले कि “जौं मोरें मन बच अरु काया। प्रीति राम पद कमल अमाया॥ तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला॥” ये वचन सुनते ही प्रभु श्री हनुमानजी 'कोसलपति श्री रामचंद्रजी की जय हो, जय हो' कहते हुए उठ बैठे।

लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल।
प्रीति न हृदय समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक॥

श्री भरतजी ने प्रभु श्री हनुमानजी को हृदय से लगा लिया, उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में आनंद तथा प्रेमाश्रुओं का जल भर आया। रघुकुलतिलक श्री रामचंद्रजी का स्मरण करके श्री भरतजी के हृदय में प्रीति न समाती थी। जब प्रभु श्री हनुमानजी संजीवनी बूटी लेने गए थे तो हृदय में प्रभु श्री रामजी को बसाकर चले थे, यथा “राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजनसुत बल भाषी॥” और जिस हृदय में प्रभु श्री रामजी बसे हों उसे हृदय से लगाकर श्री भरतजी को प्रभु की याद न आए ऐसा संभव ही नहीं। उनका हृदय गदगद हो गया, कंठ प्रभु को याद करके अवरुद्ध हो गया। वे प्रभु श्री हनुमानजी से बोले – “तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी॥” तब प्रभु श्री हनुमानजी उन्हें पूरी कथा सुना देते हैं।

जब प्रभु श्री हनुमानजी संजीवनी बूटी लेने गए थे तो हृदय में प्रभु श्री रामजी को बसाकर चले थे और जब लौटे तो “भरत बाहुबल सील गुन प्रभुपद प्रीति अपार। मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार॥” अर्थात श्री भरतजी के अपार बाहुबल, शील, गुण और अपार प्रभुपद प्रेम की सराहना करते हुए लौटे। श्री भरतजी के गुण ही ऐसे हैं कि उनका प्रेम देखकर सभी मुग्ध हो जाते हैं।

भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई॥
कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे॥

श्री भरतजी के शील, गुण, नम्रता, बड़प्पन, भाईचारा, भक्ति, भरोसे और अच्छेपन का वर्णन करने में भगवती सरस्वतीजी की बुद्धि भी हिचकती है। उनका संपूर्ण वर्णन करना सीप से समुद्र उलीचने का प्रयास करने बराबर है।

इधर जब आधी रात बीत गई और प्रभु श्री हनुमानजी नहीं आए तो श्री लक्ष्मणजी की अवस्था देख प्रभु श्री रामजी अत्यंत व्याकुल हो उठे, यथा - बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन। स्रवत सलिल राजिव दल लोचन॥ उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई॥ अर्थात चिंता से छुड़ाने वाले प्रभु श्री रामजी बहुत प्रकार से चिंता कर रहे हैं। उनके कमल की पंखुड़ी के समान श्रीनेत्रों से विषाद के आँसुओं का जल बह रहा है। प्रभु को दुःखी देख समस्त वानर समूह भी विकल हो गया, यथा - प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर। आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस॥

उसी समय प्रभु श्री हनुमानजी इतनी तेजी से वहाँ पहुँचे जैसे करुणा में वीर रस आ गया हो। प्रभु श्री रामजी ने हर्षित होकर उन्हें तुरंत हृदय से लगा लिया और उनकी बहुत प्रशंसा की। प्रभु श्री हनुमान को हृदय से लगाते ही प्रभु श्री रामजी कहते हैं कि ‘हनुमान’ पहले तुम्हें हृदय से लगाता था तो लगता था कि स्वयं से मिल रहा हूँ, लेकिन आज न जाने क्यों तुम्हें हृदय से लगाकर ऐसा लग रहा है कि मैं अपने ‘भरत’ से मिल रहा हूँ।

प्रभु श्री हनुमानजी को हृदय से लगाने का आनंद तो श्री भरतजी एवं प्रभु श्री रामजी ही जानते हैं। कितना अद्भुत अनुभव है कि जब श्री भरतजी उन्हें हृदय से लगाते हैं तो उन्हें प्रभु श्री रामजी की याद आती है और जब प्रभु श्री रामजी उन्हें हृदय से लगाते हैं तो उन्हें श्री भरतजी की याद आती है। इसे इस तरह देखा जा सकता है कि प्रभु श्री हनुमानजी जब भक्त से गले मिलते है तो उन्हें भगवान की याद दिलाते हैं और जब वे भगवान से गले मिलते हैं तो उन्हें भक्त की याद दिलाते हैं। इस भाव की मात्र कल्पना ही की जा सकती है, इसे शब्दों में व्यक्त करना संभव ही नहीं है।

यहाँ एक शंका मन में आ सकती है कि प्रभु श्री रामजी ने प्रभु श्री हनुमानजी की तुलना यहाँ श्री भरतजी से ही क्यों की? इसका समाधान यह है कि प्रभु श्री हनुमानजी के आने के पूर्व प्रभु श्री रामजी अत्यंत व्याकुल थे। अत्यंत व्याकुलता की स्थिति में मनुष्य अपने प्रिय व्यक्ति को अवश्य याद करता है। जैसे महिलाएँ चौथ का व्रत करती हैं और श्री चन्द्रमाजी के दर्शन करके ही अपना व्रत खोलती हैं। जब किसी को दूर स्थित श्री चन्द्रमाजी का दर्शन कराना हो, तो प्रायः किसी निकट की वस्तु का सहारा लेकर उस दिशा की ओर संकेत किया जाता है—जैसे, “देखिए, श्री चन्द्रमाजी पेड़ के पत्तों के पीछे हैं।” श्री चन्द्रमाजी बहुत दूर होते हैं, लेकिन निकट की वस्तु का सहारा लेने से उनका दर्शन सहज ही हो जाता है।

इसी प्रकार, जब प्रभु श्री रामजी को प्रभु श्री हनुमानजी की अत्यंत प्रियता दिखानी थी, तो उन्होंने अपने सबसे प्रिय श्री भरतजी का उदाहरण दिया कि “तुम मुझे भरत के समान प्रिय हो।” श्री भरतजी प्रभु श्री रामजी को अत्यंत प्रिय हैं। इसलिए प्रभु श्री रामजी ने श्री भरतजी की उपमा देकर यह बताया कि प्रभु श्री हनुमानजी उन्हें अतिशय प्रिय हैं। 

यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि श्री भरतजी प्रभु के परिकर (श्री चक्रराज सुदर्शनजी के अवतार) हैं जबकि प्रभु श्री हनुमानजी साक्षात श्री रुद्रावतार हैं यानी प्रभु श्री महादेवजी ही हैं, यथा - रुद्र देह तजि नेह बस, वानर भे हनुमान”। प्रभु श्री रामजी एवं प्रभु श्री महादेवजी को एक-दूसरे से प्रिय कोई नहीं है, यह बात जगत प्रसिद्ध है। प्रभु श्री महादेवजी का श्री रुद्रावतार दास भाव से प्रभु की सेवा के लिए ही हुआ हैं, इसलिए अगर श्री भरतजी प्रभु को बहुत प्रिय  हैं तो प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु को अतिशय प्रिय हैं, जो प्रियता की परिसीमा है।

जैसे दूर स्थित चन्द्रमा को दिखाने के लिए निकट की वस्तु का सहारा लिया जाता है, वैसे ही प्रभु श्री रामजी ने श्री हनुमानजी के लिए अपनी अतिशय प्रियता को व्यक्त करने के लिए श्री भरतजी का उदाहरण दिया। उपमा हमेशा सर्वश्रेष्ठ की दी जाती है और यह उपमा जब प्रभु श्री हनुमानजी को दी जानी हो तो श्री भरतजी ही सर्वदा उपयुक्त दिखाई देते हैं। श्री भरतजी भी प्रभु श्री हनुमानजी की भाँति प्रभु से निष्काम एवं अनन्य प्रेम करते हैं। प्रभु श्री रामजी और श्री भरतजी का प्रेम अतुलनीय है। श्रीरामचरितमानसजी के अयोध्याकाण्ड में गोस्वामीजी श्री तुलसीदासजी लिखते हैं – “अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को॥ सो मैं कुमति कहौं केहि भाँति। बाज सुराग कि गाँडर ताँती॥” अर्थात श्री भरतजी और प्रभु श्री रामजी का प्रेम अगम्य है, जहाँ त्रिदेवों का भी मन नहीं जा सकता। उस प्रेम को मैं कुबुद्धि किस प्रकार कहूँ! भला, गाँडर (एक प्रकार की घास) की ताँत से भी कहीं सुंदर राग बज सकता है। तो जरा सोचिए श्री भरतजी की उपमा जिन्हें दी गई हो वे प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु को कितने अतिशय प्रिय होंगे।

और अधिक गहराई से विचार किया जाए तो प्रभु श्री हनुमानजी क्या लेने गए थे – “संजीवनी बूटी” और संजीवनी बूटी क्या हैं – “रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥” अर्थात श्री रघुनाथजी की भक्ति ही संजीवनी हैं। प्रभु श्री हनुमानजी अपने हृदय में श्री भरतजी के प्रभु प्रेम की सराहना करते-करते लौटे। श्री भरतजी साक्षात भक्ति स्वरूप हैं। तो जैसे ही प्रभु श्री हनुमानजी असली संजीवनी अर्थात श्री भरतजी की भक्ति एवं प्रेम को साथ लेकर लौटे, प्रभु श्री रामजी ने उन्हें हृदय से लगाकर उन्हें श्री भरतजी के समान प्रिय कहा। प्रभु ने श्री हनुमानजी की भी बहुत प्रशंसा की साथ-ही-साथ श्री भरतजी को भी महिमा प्रदान की। अपने दो प्रिय भक्तों को एक साथ मान दिया।

श्री हनुमान चालीसा जी में गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने प्रभु श्री रामजी के लिए प्रायः “राम” शब्द का ही प्रयोग किया है। लेकिन इस चौपाई में वे प्रभु को “रघुपति” संबोधित करते हैं। यहाँ “रघुपति” शब्द बहुत ही भावगर्भित है। “रघुपति” से रघुकुल के स्वामी होने का बोध कराया। श्री दशरथजी के शरीर त्याग के बाद एवं श्री भरतजी को श्री चित्रकूट में दिए हुए वचन अनुसार प्रभु श्री रामजी ही “रघुपति” हुए। श्री भरतजी ने आपकी श्री चरण पादुका को ही सिंहासन पर विराजित करके आपके प्रतिनिधि के रूप में राज्य संभाला।

पुनः रघुकुल की कीर्ति को अलंकृत रखना एवं उसकी रक्षा कर उसका पालन करना “रघुपति” का ही दायित्व है। श्री लक्ष्मणजी के मूर्छित हो जाने पर एवं उनके प्राणों पर पर संकट आया तो प्रभु चिंतित हुए, विलाप भी किया और जैसे ही प्रभु श्री हनुमानजी संजीवनी लेकर आए तो रघुकुल के स्वामी होने के नाते “रघुपति” प्रभु श्री रामजी ने आपकी बहुत प्रशंसा की। इसलिए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी लिखते हैं - “रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

प्रभु श्री हनुमानजी को भगवती सीता माता ने लंका दहन कर लौटते समय आशीर्वाद दिया था कि प्रभु श्री रघुनाथजी तुमसे बहुत प्रेम करें, तुम पर बहुत कृपा करें, यथा – “अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥ करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥” प्रभु श्री हनुमानजी तो यह आशीर्वाद पाकर ही प्रभु के पूर्ण प्रेम में मग्न हो गए थे क्योंकि भगवती सीता माता का आशीर्वाद अमोघ है, यथा – “अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता”। आज माता का यह आशीर्वाद फलीभूत हो गया जब प्रभु श्री रामजी ने स्वयं प्रभु श्री हनुमानजी से कहा कि “तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥” जब जीवन में प्रभु श्री रामजी का प्रेम प्राप्त हो जाए तो जीवन में और कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता।