सहस बदन तुम्हरो जस गावैं ।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥१३॥
शब्दार्थः सहस बदन = हजार मुख वाले श्री शेषनागजी। जस = यश। गावैं = गाते हैं। अस कहि = ऐसा कहकर। श्रीपति = लक्ष्मीपति, शोभा के स्वामी। कंठ लगावैं = गले लगाते हैं।
अर्थः प्रभु श्री रामजी ने आपको यह कहकर गले से लगा लिया कि हजार मुख वाले श्री शेषनागजी तुम्हारा यशगान करते हैं।
गूढ़ अर्थः पिछली दो चौपाइयों में हमने श्री लक्ष्मणजी को वीरघातिनी शक्ति लगने के प्रसंग को विस्तार से देखा। जब प्रभु श्री हनुमानजी संजीवनी बूटी ले आए तो प्रसन्न होकर प्रभु श्री रामजी ने उनकी बहुत प्रशंसा की और उन्हें श्री भरतजी के समान बताया। यह चौपाई भी उसी प्रसंग को आगे बढ़ाती है जिसके अंतर्गत प्रभु श्री रामजी यह कहकर प्रभु श्री हनुमानजी को गले लगा लेते हैं कि सहस बदन (हजार मुख वाले) श्री शेषजी आपका यशगान करते हैं।
सहस बदनः आम बोलचाल की भाषा में ‘बदन’ शब्द का अर्थ होता है, देह अथवा शरीर। जिससे कई लोग ‘सहस बदन’ का अर्थ ‘हजारों लोग’ लगा लेते हैं एवं इस चौपाई का त्रुटिपूर्वक ऐसा अर्थ लगा लेते हैं कि हजारों लोग आपका यशगान करते हैं। श्री हनुमान चालीसा जी मूलतः अवधी भाषा में लिखी गई है एवं इसे समझने के लिए मुख्य रूप से हमें गोस्वामी श्री तुलसीदासजी की लेखन शैली को भी समझना होगा, जिसके लिए श्रीरामचरितमानसजी से उत्तम श्रीग्रंथ कोई नहीं है।
गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानसजी में जहाँ-जहाँ पर भी ‘बदन’ शब्द का प्रयोग किया है उसका अभिप्राय ‘मुख’ से ही है, यथा –
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
अर्थात प्रभु श्री हनुमानजी माता सुरसा से कहते हैं कि एक बार प्रभु श्री रामजी का कार्य करके मैं लौट आऊँ और भगवती सीता माता की खबर प्रभु को सुना दूँ, तब मैं आकर तुम्हारे मुँह में स्वयं चला जाऊँगा तब तुम मुझे खा लेना। हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दो।
“जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥” अर्थात जैसे-जैसे सुरसा मुख का विस्तार बढ़ाती थी, प्रभु श्री हनुमानजी उसका दुगुना रूप दिखलाते थे। उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट हैं कि गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने ‘बदन’ शब्द का उपयोग मुख के लिए ही किया है। जिससे ‘सहस बदन’ का अर्थ निकलता है – ‘हजार मुख’ एवं हजार मुख वाले केवल श्री शेषजी ही हैं जो प्रभु सेवा हेतु श्री लक्ष्मणजी के रूप में अवतरित हुए हैं, यथा -
सेष सहस्रसीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन॥
सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपासिन्धु सौमित्रि गुनाकर॥
गोस्वामी श्री तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानसजी में लिखते हैं कि जो हजार सिर वाले और जगत के कारण हैं अर्थात हजार सिरों पर जगत को धारण कर रखने वाले श्री शेषजी हैं, और जिन्होंने पृथ्वी का भय दूर करने के लिए अवतार लिया है, वे गुणों की खान कृपासिंधु सुमित्रानंदन श्री लक्ष्मणजी मुझ पर सदा प्रसन्न रहें।
श्रीरामचरितमानसजी के अयोध्याकाण्ड में श्रीवाल्मीकिजी प्रभु श्रीरामजी से कहते हैं -
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥
जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी।
सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी॥
अर्थात हे श्री रामजी! आप श्री वेदों की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और भगवती जानकीजी आपकी स्वरूप भूता माया हैं। जो हजार मस्तक वाले सर्पों के स्वामी और पृथ्वी को अपने सिर पर धारण करने वाले हैं, वही चराचर के स्वामी श्री शेषजी ही ‘लक्ष्मण’ हैं। उपरोक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि सहस बदन से यहाँ तात्पर्य हजार मुख वाले श्री शेषजी से है। श्री शेषजी के हजार मुख हैं जिनसे वे नित्य प्रसन्नतापूर्वक भगवान का गुणगान करते हैं। इन्हीं श्री शेषजी के अवतार श्री लक्ष्मणजी हैं।
पिछली दो चौपाइयों में हमने देखा कि श्री लक्ष्मणजी को शक्ति लगने पर वे मूर्छित हुए, प्रभु श्री हनुमानजी संजीवनी लेकर जैसे ही आए प्रभु श्री रामजी ने हर्षित होकर उन्हें हृदय से लगा लिया और उन्हें श्री भरतजी के समान बताकर उनकी बहुत प्रशंसा की।
हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना॥
तुरत बैद तब कीन्ह उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई॥
हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता॥
तत्पश्चात सुषेण वैद्य ने तुरंत उपाय किया, जिससे श्री लक्ष्मणजी तुरंत प्रसन्न होकर इस तरह उठ बैठे जैसे कोई सुख की नींद सोकर प्रसन्न होकर उठता है, मानो कोई गहरी नींद से जागा हो, कोई कष्ट नहीं था।
प्रभु श्री रामजी ने तुरंत श्री लक्ष्मणजी को गले लगा लिया, यह उनकी श्री लक्ष्मणजी के लिए परम प्रेमाकुलता थी और यही भाव श्री लक्ष्मणजी में भी थे। दोनों के नेत्र प्रेमाश्रुओं से भर गए। समस्त भालू एवं वानरों के समूह सब हर्षित हो गए। एक ही समय में तीन अलग-अलग भावों की अतिरेकता देखी गई। जब तक प्रभु श्री हनुमानजी नहीं आए थे तब तक करुण रस, प्रभु श्री हनुमानजी आए ही इस तरह कि “जिमि करुणा मह वीर रस” और श्री लक्ष्मणजी के सचेत होते ही सर्वत्र आनंद और उत्साह देखा गया।
श्री लक्ष्मणजी की मूर्छा भंग होने से सभी अत्यंत प्रसन्न हुए पर सर्वाधिक प्रसन्न हुए स्वयं श्री लक्ष्मणजी। क्योंकि उन्होंने अब तक विपत्ति में एक क्षण के लिए भी प्रभु का साथ न छोड़ा था। प्रभु के भोजन करने के बाद ही वे भोजन करते थे, उनके सोने के बाद ही वे सोते थे एवं उनके उठने के पहले ही वे उठ जाते थे। वे कभी प्रभु को दुःखी देख ही नहीं सकते थे तो उनके स्वयं के बिछोह में प्रभु दुःखी हो जाते यह वे कैसे सह सकते थे। जिन प्रभु के लिए श्री लक्ष्मणजी ने माता-पिता, बंधु, स्त्री, गृह, राज्य सबका त्याग कर दिया प्रभु श्री हनुमानजी के कारण वे अब उन प्रभु की फिर से सेवा कर पाएंगे।
श्री लक्ष्मणजी ‘शेषावतार’ हैं अर्थात वे श्री शेषजी के अंश से उद्भूत हैं। तो अपने अंश श्री लक्ष्मणजी को जीवन मिलते ही स्वयं श्री शेषनागजी (सहस बदन) प्रभु श्री हनुमानजी का यशगान करते हैं। अपने अंश को जीवन दिलाने के कारण श्री शेषनागजी आपका गुणगान करते हैं एवं प्रभु सेवा का अवसर पुनः दिलाने के कारण श्री शेषावतार लक्ष्मणजी भी आपका गुणगान करते हैं। यहां एक बात और ध्यान देने योग्य है कि प्रभु श्री हनुमानजी ‘रुद्रावतार’ हैं और प्रभु श्री महादेवजी का यशगान प्रभु श्री रामजी स्वयं करते हैं और उनसे अतिशय प्रेम करते हैं। श्री शेषजी प्रभु के परम सेवक हैं और जिन प्रभु श्री हनुमानजी की प्रशंसा स्वयं प्रभु करें उनका यशगान श्री शेषजी न करें ऐसा संभव ही नहीं।
जब प्रभु श्री हनुमानजी ने भगवती सीता माता को संग्राम में विजय का समाचार दिया था तब माता ने भी उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा था -
सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत।
सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत॥
अर्थात हे पुत्र! सुनो, समस्त सद्गुण तुम्हारे हृदय में आ बसें और श्री शेषजी (श्री लक्ष्मणजी) सहित कोसलपति प्रभु सदा तुम पर प्रसन्न रहें। इन्हीं सब बातों तो ध्यान में रखकर गोस्वामी श्री तुलसीदासजी लिखते हैं – “सहस बदन तुम्हरो जस गावैं”।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैः “चौपाई ११ लाय सजीवन लखन जियाये” के अंतर्गत हमने देखा था कि जैसे ही प्रभु श्री हनुमानजी संजीवनी बूटी लेकर आए थे प्रभु श्री रामजी ने उन्हें प्रसन्न होकर हृदय से लगा लिया था। तब फिर मात्र एक चौपाई के बाद पुनः गले क्यों लगाया?
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि तब गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने कहा था कि “श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥” यहाँ वे कहते हैं कि “अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं”। तब ‘श्रीरघुबीर’ संबोधन दिया था और अब ‘श्रीपति’ संबोधन दे रहे हैं। तत्वतः भले ही दोनों एक ही हैं लेकिन अलग-अलग संबोधन से यह स्पष्ट है कि आशय अलग-अलग है।
“चौपाई ११ लाय सजीवन लखन जियाये” में ‘श्रीरघुबीर’ संबोधित करके रघुकुल के स्वामी होने का बोध कराया था। श्री दशरथजी के शरीर त्याग के बाद एवं श्री भरतजी को श्री चित्रकूट में दिए हुए वचन अनुसार प्रभु श्री रामजी ही रघुकुल के स्वामी हैं। तो यहाँ ये भाव दिखाया था कि आप रघुकुल के स्वामी हैं और अपने अनुज श्री लक्ष्मणजी की प्राण रक्षा हेतु संजीवनी लाने से प्रसन्न होकर आपने प्रभु श्री हनुमानजी को हृदय से लगा लिया।
लेकिन इस चौपाई में गोस्वामीजी प्रभु को ‘श्रीपति’ संबोधित करते हैं। मूल रूप से देखा जाए तो प्रभु श्री रामजी ‘श्रीपति’ अर्थात ‘लक्ष्मीपति’ ही हैं। इसके प्रमाण साक्षात प्रभु श्री महादेवजी हैं जिन्होंने भगवती सीता माता के वियोग में विलाप कर रहे प्रभु श्री रामजी को देखते ही कहा था – “जय सच्चिदानंद जग पावन।” अर्थात जगत को पवित्र करने वाले सच्चिदानंद प्रभु की जय हो।
प्रभु श्री रामजी भगवती सीता माता के वियोग में अत्यंत विकल थे –
बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई॥
कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुखु ताकें॥
अर्थात श्रीरघुनाथजी मनुष्यों की भाँति विरह से व्याकुल हैं और दोनों भाई वन में भगवती सीता माता को खोजते हुए घूम रहे हैं। जिनके कभी कोई संयोग-वियोग नहीं है, उनमें प्रत्यक्ष विरह का दुःख देखा गया। लेकिन जब नरलीला कर रहे प्रभु श्री रामजी को देखकर प्रभु श्री महादेवजी ने जब ‘जय सच्चिदानंद’ कहकर दूर ही से मन-ही-मन प्रणाम किया तो भगवती सती माता आश्चर्यचकित रह गई, यथा -
संकरु जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा॥
तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधामा॥
भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी॥
अर्थात प्रभु श्री महादेवजी की सारा जगत वंदना करता है, वे जगत के ईश्वर हैं। देवता, मनुष्य, मुनि सब उन्हें प्रणाम करते हैं। वे प्रभु श्री महादेवजी एक राजा के पुत्र को सच्चिदानंद परमधाम कहकर प्रणाम कर रहे हैं और उन्हें देखकर वे इतने प्रेममग्न हो गए कि उनके हृदय में प्रीति रोकने से भी नहीं रुकती।
अति बिचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।
जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन॥
प्रभु श्रीरघुनाथजी का चरित्र बड़ा ही विचित्र है, उसको पहुँचे हुए ज्ञानीजन ही जान पाते हैं। जो मंदबुद्धि हैं, वे तो विशेष रूप से मोह के वश होकर हृदय में कुछ दूसरी ही बात समझ बैठते हैं। सो प्रभु कब क्या करेंगे इसको जान पाना या समझ पाना प्रभु कृपा बिना संभव नहीं। उनकी श्रीलीलाओं में किंचित भी संदेह उचित नहीं।
भगवती सती माता के मन में संदेह हुआ कि जो ब्रह्म सर्वव्यापक, मायारहित, अजन्मा, अगोचर, इच्छारहित और भेदरहित है और जिसे वेद भी नहीं जानते, क्या वे देह धारण करके मनुष्य हो सकते है? तब भगवती सती माता के संदेह को देखते हुए प्रभु श्री महादेवजी ने अपने इष्टदेव का परिचय इस प्रकार दिया था –
मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं।
कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं॥
सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी।
अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनी॥
तो प्रभु श्री महादेवजी के वचनों से यह स्पष्ट है कि प्रभु श्री रामजी ही ‘श्रीपति’ है। ‘श्रीपति’ की सेवा में सदा रहने वाले श्री शेषजी ही शेषावतार रूप में श्री लक्ष्मणजी हैं, यह हम पहले ही देख चुके हैं। इसलिए जब गोस्वामी श्री तुलसीदासजी जब श्री लक्ष्मणजी को सहसबदन रूप में देखते हैं तो भगवती सीता माता को भगवती लक्ष्मीजी के रूप में देखते हैं एवं प्रभु श्री रामजी को ‘श्रीपति’ रूप में देखते हैं।
चिंतन करने पर यहाँ एक भाव और पुष्ट होता हैं कि उपरोक्त प्रसंग में प्रभु श्री महादेवजी ने अपने इष्ट को नरलीला करते देखा और उन्हें प्रणाम किया तो प्रभु श्री रामजी कहाँ पीछे रहने वाले थे। उनके इष्ट प्रभु श्री महादेवजी भी तो वानर लीला कर रहे थे, सो श्रीपति ने भी अपने इष्ट को वानर लीला करते देख उन्हें गले से लगा लिया। जब प्रभु श्री महादेवजी अपने इष्ट को पहचानते हैं तो प्रभु श्री रामजी भी अपने इष्ट को पहचानते हैं। दोनों के परस्पर प्रेम का वर्णन कर पाना संभव ही नहीं है। तो इस चौपाई में ‘श्रीपति’ कहकर गोस्वामीजी ने जनाया कि सच्चिदानंद परमधाम प्रभु स्वयं प्रभु श्री हनुमानजी को गले लगा रहे हैं और श्री शेषजी भी उनका यश गान कर रहे हैं। इसी से वे लिखते हैं कि “सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥”