श्री हनुमान चालीसा जी - सम्पूर्ण सरल व्याख्या

जय श्री राम
श्री हनुमान चालीसा जी "प्रभु श्री हनुमानजी" की महिमा का अद्भुत स्तुति ग्रंथ है, जिसे गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने रचा है। इसमें 40 चौपाइयाँ एवं 03 दोहे हैं, जिनमें प्रभु श्री हनुमान जी की भक्ति, बल, बुद्धि और सेवा भाव का सुंदर वर्णन किया गया है।

श्री हनुमान चालीसा जी का पाठ करने से मन में साहस, आत्मविश्वास और शांति का अनुभव होता है। यह हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति, निःस्वार्थ सेवा और प्रभु के प्रति प्रेम से जीवन में आने वाली कठिनाइयों को भी आसानी से पार किया जा सकता है। यदि हम इसके अर्थ को समझकर इसका पाठ करें, तो यह हमारे जीवन को भक्ति, सकारात्मकता और शक्ति से भर देता है।

इस वेबसाइट पर श्री हनुमान चालीसा जी की हर चौपाई को बहुत ही आसान भाषा में समझाया गया है, ताकि कोई भी व्यक्ति इसे बिना कठिनाई के समझ सके। यहाँ आपको हर चौपाई का सरल अर्थ, गुढ़ अर्थ, आध्यात्मिक भाव और उसका महत्व सीधे और सरल शब्दों में मिलेगा। हमारा प्रयास है कि आप श्री हनुमान चालीसा जी को केवल पढ़ें ही नहीं, बल्कि उसे अच्छी तरह समझ भी सकें।

सभी चौपाइयों को क्रम से और विस्तार से समझाया गया है, ताकि आपको पूरी श्री हनुमान चालीसा जी का अर्थ धीरे-धीरे और स्पष्ट रूप से समझ में आए। अगर आप श्री हनुमान चालीसा जी को आसान और सही अर्थ में समझना चाहते हैं, तो यह वेबसाइट आपके लिए बहुत उपयोगी है।

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अगली चौपाईः रविवार, 18 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित की जाएगी।

चौपाई १६ः तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा ।
राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥१६॥

शब्दार्थः सुग्रीवहिं = सुग्रीव पर। कीन्हा = किया । मिलाय = मिलवाकर, भेंट कराकर। दीन्हा = दिया।

अर्थः आपने सुग्रीव जी पर उपकार किया। उन्हें प्रभु श्री रामजी से मिलाया, जिसके कारण वे राजा बने।

गूढ़ अर्थः गोस्वामी श्री तुलसीदासजी ने पिछली पाँच चौपाई अर्थात चौपाई ११ से चौपाई १५ तक श्रीलक्ष्मण-शक्ति-प्रसंग का वर्णन किया जिसके अंतर्गत गोस्वामीजी ने समस्त ऋषिगण, मुनिगण, श्री सनकादिक, प्रभु श्री ब्रह्माजी, देवर्षि श्री नारदजी, भगवती सरस्वतीजी, श्री शेषनागजी, श्री यमराजजी, श्री कुबेरजी समेत समस्त दिकपालों द्वारा प्रभु श्री हनुमानजी की महिमा का गान बताया। उसी क्रम में अब गोस्वामी श्री तुलसीदासजी जी भी कुछ महत्वपूर्ण प्रसंगों के माध्यम से आपका यशगान करते हैं।

श्री शिवमहापुराण जी के सप्तम खंड में कथा आती है कि प्रभु श्री हनुमानजी ने अपने गुरु श्री सूर्यदेवजी से शिक्षा पूर्ण होने पर जब गुरुदक्षिणा स्वीकार करने का आग्रह किया था तब श्री सूर्यदेवजी ने उन्हें कहा कि वे पम्पापुर में रहकर उनके अंश से उत्पन्न श्री सुग्रीव की सहायता करें, वहीं आपकी भेंट प्रभु श्री रामचंद्रजी से भी होगी। प्रभु श्री हनुमानजी ने श्री सूर्यदेव को श्री सुग्रीव की सहायता का वचन दिया एवं उनके पास आ गए। बाद में जब श्री सुग्रीव अपने भाई बालि के कारण संकट में पड़ गए, तब प्रभु श्री हनुमान जी ने उनका साथ दिया, एवं उनके साथ ऋष्यमूक पर्वत आ गए।

एक दिन श्री सुग्रीव ने अतुलित बलशाली दो पुरुषों को आते देखा तो भयभीत होकर प्रभु श्री हनुमानजी से कहा कि तुम ब्राह्मण का रूप धारण करके जाकर देखो। अगर वे बालि के भेजे हुए हों तो मैं तुरंत ही इस पर्वत से चला जाऊँगा। प्रभु श्री हनुमानजी ब्राह्मण का रूप लेकर गए एवं उनसे पूछा कि –

को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा ॥
कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी॥

अर्थात हे वीर! साँवले और गोरे शरीर वाले आप कौन हैं, जो क्षत्रिय के रूप में वन में फिर रहे हैं? हे स्वामी! कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलने वाले आप किस कारण वन में विचर रहे हैं? प्रभु श्री रामजी ने अपना परिचय देकर एवं अपनी स्थिति समझाकर प्रभु श्री हनुमानजी से कहा –

आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई॥
अर्थात हमने तो अपना चरित्र कह सुनाया। अब हे ब्राह्मण! आप अपनी कथा समझाकर कहिए।

प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा जाइ नहिं बरना॥
प्रभु को पहचानकर प्रभु श्री हनुमानजी ने उन्हें साष्टांग दंडवत्‌ प्रणाम किया। भगवती पार्वती माता से प्रभु श्री महादेवजी कहते हैं कि हे उमा! उस सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता। प्रभु श्री हनुमानजी श्रीरुद्रावतार हैं एवं उनका अवतार ही श्रीरामकाज के लिए हुआ है, यथा “रामकाज लगि तव अवतारा”। श्रीलीलावतार में प्रभु श्री हनुमानजी बाल्यावस्था में मिलन के बाद आज प्रथम बार प्रभु के सम्मुख आए है और उन्हें साक्षात सामने देखकर वे भाव-विभोर हो जाते हैं एवं उनकी स्तुति करते हैं।

प्रभु को पहचानने से यहाँ यह तात्पर्य है कि प्रभु श्री रामजी तो प्रभु श्री हनुमानजी के हृदय में ही निवास करते हैं, यथा – “जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर”। लेकिन जिन प्रभु का दर्शन अभी तक अंदर होता था, आज वे साक्षात सामने खड़े हैं। वे ही प्रभु अंदर भी हैं और वे ही बाहर भी हैं। उस सुख का मात्र चिंतन ही किया जा सकता है, शब्दों में वो सामर्थ्य नहीं कि उस सुख का वर्णन कर सकें।

प्रभु श्री रामजी ने कथा तो प्रभु श्री हनुमानजी की पूछी थी लेकिन वे कथा सुग्रीवजी की सुनाते हैं, क्योंकि अपना तो वे केवल प्रभु को ही मानते हैं और प्रभु तो अपनी कथा सुना चुके हैं। प्रभु श्री हनुमानजी कहते हैं – “नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई॥” अर्थात हे नाथ! इस पर्वत पर वानरराज सुग्रीव रहते हैं, वे आपके दास हैं। प्रभु श्री रामजी से श्री सुग्रीवजी की मित्रता करानी थी इसलिए उनका परिचय ‘कपिपति’ के रूप में दिया, साथ ही उन्हें प्रभु का दास भी बताया।

यहाँ एक शंका मन में आ सकती है कि अभी तो सुग्रीवजी प्रभु से मिले ही नहीं हैं तो पहले से दास कैसे हो गए? तो इसका समाधान यह है कि सुग्रीवजी श्रीसूर्यदेव के अंश हैं एवं प्रभु के अवतार लेने के समय प्रभु श्री ब्रह्माजी ने सभी देवताओं से भी वानर रूप में अवतार लेने को कहा था, यथा – “बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ॥” श्रीसूर्यदेव ने भी सुग्रीवजी के रूप में अवतार लिया और वे भी प्रभु की प्रतीक्षा कर रहें हैं, इसलिए उनका परिचय दास के रूप में दिया।

प्रभु श्री हनुमानजी अपने गुरु श्री सूर्यदेवजी को दिए वचन के अनुसार सुग्रीवजी को प्रभु से मिलाकर उनकी सहायता करना चाहते हैं। प्रभु श्री रामजी सूर्यवंशी हैं एवं श्री सुग्रीवजी सूर्यअंशी हैं। प्रभु श्री हनुमानजी एक सूर्यअंशी (सुग्रीवजी) को एक सूर्यवंशी (प्रभु श्री रामजी) से मिलाकर अपने गुरु श्री सूर्यदेवजी को दिया वचन पूरा करना चाहते हैं, इसलिए कहते हैं कि -

तेहि सन नाथ मयत्री कीजे। दीन जानि तेहि अभय करीजे॥
सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि॥

अर्थात हे नाथ! उनसे मित्रता कीजिए और उन्हें दीन जानकर निर्भय कर दीजिए। वे भगवती सीता माता की खोज भी कराएंगे और जहाँ-तहाँ करोड़ों वानरों को भी भेजेंगे। प्रभु श्री हनुमानजी यह कहकर मित्रता कराना चाहते हैं कि वे भी राजा और आप भी राजा, वे दीन हैं तो आप दीनबंधु हैं, वे दास हैं और आप दासों के अभयदाता हैं। सो उनके शत्रु को मारकर उन्हें अभय कर दीजिए।

एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई॥

प्रभु श्री रामजी ने उन्हें ‘निजकथा’ सुनाने को कहा था सो इस प्रकार प्रभु श्री हनुमानजी ने उन्हें सकल कथा सुनाई एवं उनसे ऋष्यमूक पर्वत पर चलने को कहा।

यहाँ एक और शंका मन में आती है कि सुग्रीवजी दास हैं तो स्वयं नीचे क्यों नहीं आए तो पहला तो मायावश प्रभु को पहचानते नहीं, दूसरा मरीज कम बीमार हो तो वैद्य के पास आता है लेकिन परिस्थिति गंभीर हो तो वैद्य को ही मरीज के पास जाना पड़ता है।

श्रीरामचरितमानसजी के अनुसार प्रभु श्री हनुमानजी ने प्रभु श्री रामजी और श्री लक्ष्मणजी दोनों को अपनी पीठ पर बैठा लिया। श्री अध्यात्म रामायण में कंधे पर बैठाने का वर्णन आता है। श्री वाल्मिकी रामायणजी के अनुसार प्रभु श्री हनुमानजी ने दोनों को अपनी पीठ पर बैठा लिया, यथा – “भिक्षुरूपं परित्यज्य वानरं रूपमास्थितः। पृष्ठमारोप्य तौ वीरौ जगाम कपिकुञ्जरः॥”

प्रभु श्री रामजी कहते हैं पीठ पर बैठने में हमें डर लग रहा है, एक तो दुर्गम पहाड़ और ऊपर से तुम पवनपुत्र, बड़ा तेज चलोगे। प्रभु श्री हनुमानजी बोले अगर आपको डर लगे तो आप आँखे बंद करके बैठ जाइए एवं मेरे सिर को पकड़ लीजिए। प्रभु श्री रामजी ने प्रभु श्री हनुमानजी का सिर पकड़ लिया और प्रभु श्री हनुमानजी ने उनके श्रीचरणकमल। प्रभु श्री हनुमानजी कहते हैं कि प्रभु अब आँखे खोल लीजिए, जिसके सिर पर आपका हाथ हो वो कभी गिर भी नहीं सकता और किसी को गिरा भी नहीं सकता। इससे अद्भुत क्या ही किसी का सौभाग्य होगा कि सिर पर प्रभु का हाथ हो और हाथों में प्रभु के श्रीचरणकमल।

सुग्रीवजी ने प्रभु को देखते ही अपने जन्म को धन्य माना और उनके श्रीचरणकमलों में दण्डवत प्रणाम कर उनसे आदरपूर्वक मिले। श्री सुग्रीवजी मन में विचार करते हैं कि मैं तो दीन हूँ, वानर हूँ, भयग्रस्त हूँ, राज्यविहीन हूँ, क्या फिर भी प्रभु मुझसे प्रीति करेंगे। प्रभु श्री हनुमानजी सुग्रीवजी की मनःस्थिति समझ जाते हैं और मित्रता का गठबंधन दृढ़ करने के लिए पहले दोनों को एक-दूसरे की कथा सुनाते हैं, यथा –

तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।
पावक साखी देइ करि जोरी प्रीति दृढ़ाइ॥

प्रभु श्री रामजी एवं सुग्रीवजी दोनों को एक-दूसरे की स्थिति का ज्ञान होना जरूरी है ताकि दोनों एक-दूसरे की सहायता कर सकें। और केवल इतना ही नहीं, वे अग्नि को साक्षी देकर उनकी प्रीति को दृढ़ कर देते हैं और एक दूसरे की सहायता की प्रतिज्ञा दिलाते हैं कि प्रभु श्री रामजी आपको अपना राज्य एवं पत्नी दिलावें एवं आप भगवती सीता माता की खोज में मदद करें।

यहाँ एक शंका मन में आ सकती है कि क्या मित्रता के लिए भी भला कोई अग्नि की साक्षी लेता है। तो इसका समाधान यह है कि प्रीति करने में अग्नि की साक्षी देने की परंपरा है क्योंकि श्री अग्निदेव सबके हृदय की बात जानते है, वे वचन के देवता हैं और मित्रता वचन के द्वारा की जा रही है। श्री अग्निदेव संपूर्ण श्रीलीला के ही साक्षी हैं, यथा भगवती सीता माता को अग्नि को ही सौंपा गया, अग्नि से ही लंका दहन हुआ, युद्ध उपरांत श्री अग्निदेव ही भगवती सीता माता को वापस देंगे। इसलिए यहाँ भी अग्नि की साक्षी दी।

प्रभु श्री हनुमानजी सुग्रीवजी से भी भलीभाँति परिचित हैं, वे जानते हैं कि समय आने पर या किसी भय से यह संभव है कि सुग्रीवजी अपने वचन से पलट जाएं लेकिन उन्हें पूरा भरोसा है कि एक बार प्रभु ने वचन दे दिया तो फिर कभी पीछे न हटेंगे, यथा “रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन ना जाई”। मित्रता निभाने में प्रभु का कोई जोड़ नहीं। इसी प्रसंग में आगे प्रभु स्वयं कहते भी हैं कि –

जे न मित्र दु:ख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥
निज दु:ख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दु:ख रज मेरु समाना॥

अर्थात जो लोग मित्र के दुःख से दुःखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है। अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुःख को बड़े भारी पर्वत के समान जानना चाहिए।

प्रभु श्री रामजी ने मित्र धर्म का पालन करते हुए बालि का वध करके सुग्रीवजी को राज्य वापस दिलाया। प्रभु ने वर्षा ऋतु आ जाने से सुग्रीवजी को अंगद सहित राज्य कहने का कहकर भगवती सीता माता की खोज वर्षा ऋतु तक के लिए रोक दी। वर्षा ऋतु बीत गई और शरद ऋतु आ गई पर अनुकूलता आने पर मायावश सुग्रीवजी ने श्रीरामकाज भुला दिया। प्रभु ने श्री लक्ष्मणजी को केवल भय दिखाकर सुग्रीवजी को ले आने भेजा।

इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा॥
निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा॥

उधर प्रभु ने श्री लक्ष्मणजी को कहा कि सुग्रीव ने मेरी सुध भुला दी है और इधर ‘पवनसुत’ प्रभु श्री हनुमानजी को विचार उठ गया कि सुग्रीवजी ने प्रभु श्री रामजी के कार्य को भुला दिया है। पवन सभी के अंदर प्राणरूप में विद्यमान हैं एवं आप श्री पवनपुत्र हैं, सो आपके हृदय में स्वमेव विचार उठा।

प्रभु श्री हनुमानजी ने सुग्रीवजी के पास जाकर उन्हें चारों प्रकार की नीति (साम, दाम, दंड, भेद) कहकर समझाया। प्रभु श्री रामजी ने आपसे मित्रता की - साम, आपको राज्य दिलाया - दाम, जिन्होंने बालि को मार दिया क्या वे आपको नहीं मार सकते - दंड और राज्य कहीं बालि पुत्र अंगद को दे दिया तो - भेद। चारों प्रकार से सुग्रीवजी को समझाकर एवं श्री लक्ष्मणजी के क्रोध को शांत करके पुनः आपने सुग्रीवजी पर उपकार किया।

इस प्रकार प्रभु श्री हनुमानजी ने श्री सुग्रीव की सहायता कर गुरु दक्षिणा के रूप में अपने गुरु को दिया वचन पूरा किया। वे जानते थे कि प्रभु श्री रामजी पालक सखा हैं और सुग्रीवजी बालक सखा हैं अर्थात सुग्रीवजी गलती करेंगे ही इसलिए उन्होंने अग्नि संस्कार कराकर प्रभु को मित्रता के वचन में वचनबद्ध कर दिया था। प्रभु श्री हनुमानजी सहज और परम उपकारी हैं। गोस्वामी श्री तुलसीदासजी श्री रामचरितमानसजी में लिखते हैं – “पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया॥” अर्थात मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यही संतों का सहज स्वभाव है।

इसलिए गोस्वामी श्री तुलसीदासजी प्रभु श्री हनुमानजी के लिए लिखते हैं कि “तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥” और प्रभु श्री रामजी से मिलाकर न केवल राजपद दिया वरन् श्रीरामपद भी दिलाकर उन्हें परमपद की प्राप्ति भी करवा दी। इतने उपकारी प्रभु श्री हनुमानजी हैं।

चौपाई १५ः जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते अगली चौपाईः रविवार, 18 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित की जाएगी।